कल रात बड़ी तूफ़ानी थी,
बस सैलाबों की होली थी,
शहर का साया सोया था,
मैंने खेली आँख मिचौली थी...
गर्दिश की परवाह नही,
न अफ़्सानो की ख्वाइश थी,
हया बहा किसी दरिये में,
मैंने ख़ुद की लगायी नुमाइश थी।
सब भूलना आसान इतना होता नही है,
जख्म तो भर जाता है,
वक्त के बाज़ार में,
दाग लेकिन अपना ज़ालिम छोड़ जाता है।
कल रात बड़ी तूफ़ानी थी,
मैं गंगा तट पर,
मोक्ष मांगने खड़ा रहा,
निराकार रूप के अन्तरमन का,
अर्थ जानने किसी घाट पर पड़ा रहा।
हिमालय सत्य जानता ही होगा,
सब उससे ही तो पूछने जाते हैं;
गीता के कुछ पाठ जानकर,
मैं धनुष तानकर,
हिम खंड पर चढ़ा रहा...
कल रात बड़ी तूफ़ानी थी
Saturday, March 21, 2009
हर शाम, एक गुमनाम चिडिया

हर शाम,
एक गुमनाम चिड़िया,
किसी नए फ़लक तक उड़ान के पश्चात्, घोसले में लौटती थी,
नन्ही उँगलियों से टाईपराइटर पर फुदक कर,
कुछ नए शब्द खोजती थी।
मैंने पढ़ा, सुना और तस्वीरों में देखा है,
ये दुनिया,
जिंदगी की तरह गोल, बिल्कुल गोल दिखती है;
तुम बहुत तेज़ हा धीरे चलोगे,
वापस वहीँ पहुँच जाऊगे।
शब्दों के मेले से चिड़िया,
नए रिश्ते, नई स्याही लाती थी,
नन्ही उँगलियों में सपने दबाकर,
टाईपराइटर पर फुदकती,
अपने आँगन में, स्नेह का चादर बिछाती थी।
ये बादल भी, कितने पागल होते हैं;
मांग कर और छीन कर, कतरा कतरा पानी का,
दूर देश से लाते हैं;
प्यासी धरती को देख तड़पता,
पल भर में बह जाते हैं।
टाईपराइटर के नए अक्षर,
नई स्याही, नया पेपर
नए बहने, नए विचार,
नई रचना पर वही आधार...
हर शाम एक गुमनाम चिड़िया,
वही धुन लिख जाती थी,
फुदक कर फिर टहनियों पर,
प्रियतम को सुनती थी।
Sunday, March 08, 2009
Book Mark
Sunday, March 01, 2009
एहसास के टुकड़े
वक्त ख़ुद बेवक्त
हमारे लिए,
उपहार में, सूखी टहनी छोड़ जाता है;
एक झटके में न जाने,
कितने रस्ते, कितने रिश्ते मोड़ जाता है...
हमारे लिए,
उपहार में, सूखी टहनी छोड़ जाता है;
एक झटके में न जाने,
कितने रस्ते, कितने रिश्ते मोड़ जाता है...
लोग घाव से बहते अपने लहू से,
दर्द को कभी सींचते है,
या हरे चादर में छिपाकर,
हंसके ख़ुद को नोचते है...
इंसान को छोटी चीज़ें खीचने का कीडा होता है,
टहनियों को वृक्ष, और वृक्ष को अंतरिक्ष बनाता है,
हर बार अपने हाथों में किल ठोकता है;
ख़ुद को खुश रखने के लिए,
रह रह कर अपना दर्द सुनाता है।
संघर्ष की पोटली, herosim का एहसास,
वक्त की टहनियां,
झोले भर बकवास..
Saturday, February 28, 2009
Professional Mails
For an outsourcing service industry, the number of so called professional circulating mail was an enigma for me. I thought to understand the physics behind it and wrote some equations. The result was interesting...
The market forces always defined in terms of supply and demand.
So, for an outsourcing industry the forces behind number of such mails
= modulus of (Demand - Supply)
And, the fluctuation of market depends on large difference of supply and demand. Therefore, a negative factor should be present.
Mails = - modulus of (Demand - Supply)
Demand = (Global GDP + Currency fluctuations + Political Conditions + Socio-Economic Conditions + Others) * ( Factor of Cost ) ^n
Supply = (Local GDP + Labour Force + quality*efficiency*client satisfaction)* ( Factor of Cost ) ^m, where m and n are some variables.
Therefore, Mails = - modulus of (Global GDP + Currency fluctuations + Political Conditions + Socio-Economic Conditions + Others)* ( Factor of Cost )^ n - Local GDP + Labour Force + quality*efficiency*client satisfaction)* ( Factor of Cost ) ^m
For an normal economic condition n=m=some constant
Mails = - modulus of (A) * ( Factor of Cost )^n - (B)* ( Factor of Cost ) ^m
= - ( Factor of Cost ) * Some Constants
Factor of Cost is a variable.
Thus mails = - a one degree variable* Constant
This is an S.H.M . If market fluctuates more the equation takes logarithmic or exponential form.
The market forces always defined in terms of supply and demand.
So, for an outsourcing industry the forces behind number of such mails
= modulus of (Demand - Supply)
And, the fluctuation of market depends on large difference of supply and demand. Therefore, a negative factor should be present.
Mails = - modulus of (Demand - Supply)
Demand = (Global GDP + Currency fluctuations + Political Conditions + Socio-Economic Conditions + Others) * ( Factor of Cost ) ^n
Supply = (Local GDP + Labour Force + quality*efficiency*client satisfaction)* ( Factor of Cost ) ^m, where m and n are some variables.
Therefore, Mails = - modulus of (Global GDP + Currency fluctuations + Political Conditions + Socio-Economic Conditions + Others)* ( Factor of Cost )^ n - Local GDP + Labour Force + quality*efficiency*client satisfaction)* ( Factor of Cost ) ^m
For an normal economic condition n=m=some constant
Mails = - modulus of (A) * ( Factor of Cost )^n - (B)* ( Factor of Cost ) ^m
= - ( Factor of Cost ) * Some Constants
Factor of Cost is a variable.
Thus mails = - a one degree variable* Constant
This is an S.H.M . If market fluctuates more the equation takes logarithmic or exponential form.
Tuesday, February 24, 2009
चौकड़ी
I was trying to experiment with style of poems. It came in my mind to design 4 liner poem, where the first three lines will define same object through different subjects (Science, Arts, Maths..). The last one will be philosophical end to these. I thought to call it "चौकड़ी".
example - चाँद
खरबों किलोमीटर दूर होगा कोई मुझसे,
मेरे बेटे के खिलोने जैसा दिखता है वो,
फिर भी पूजती हूँ उसे, नत् होती हूँ,
खुद से ऊपर बैठा हर कोई बड़ा ही होता है.
Try your hands....
example - चाँद
खरबों किलोमीटर दूर होगा कोई मुझसे,
मेरे बेटे के खिलोने जैसा दिखता है वो,
फिर भी पूजती हूँ उसे, नत् होती हूँ,
खुद से ऊपर बैठा हर कोई बड़ा ही होता है.
By- वर्तिका
Wallet
Wallet
So many murders for leather to preserve fate,
Handy, trendy, branded, I prefer it for my date,
My wallet is wet in tears, have recession in its eyes,
We shrink our life as we grow up in size.
Try your hands....
Thursday, February 19, 2009
पगली चूड़ी
अपने सरगम पर इठलाती,
जी भर हंसती, चुप हो जाती।
रेत पे संवरी, नदी के तट पर,
पगली चूड़ी का स्पव्न सुना है;
मैं कलम नही, और न कोई दर्पण,
फिर भी तेरे उलझे धागों से,
मैंने अपना आकाश बुना है।
रंगोली के रंग में खिलती,
पगली चूड़ी का स्पव्न सुना है;
बातूनी इस चूड़ी से,
मैं डरता भी हूँ, लड़ता भी;
उसने कितनो को पगला बोला है,
ये तो कभी ना बतला पाऊंगा,
खनक पे भटके प्यासे प्याले,
गिन कर भी क्या कर पाऊंगा...
बड़ी बांवरी है, कागज की कश्ती,
पाकर भी इसे घबराऊंगा।
जी भर हंसती, चुप हो जाती।
रेत पे संवरी, नदी के तट पर,
पगली चूड़ी का स्पव्न सुना है;
मैं कलम नही, और न कोई दर्पण,
फिर भी तेरे उलझे धागों से,
मैंने अपना आकाश बुना है।
रंगोली के रंग में खिलती,
पगली चूड़ी का स्पव्न सुना है;
बातूनी इस चूड़ी से,
मैं डरता भी हूँ, लड़ता भी;
उसने कितनो को पगला बोला है,
ये तो कभी ना बतला पाऊंगा,
खनक पे भटके प्यासे प्याले,
गिन कर भी क्या कर पाऊंगा...
बड़ी बांवरी है, कागज की कश्ती,
पाकर भी इसे घबराऊंगा।
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हम चुनेंगे कठिन रस्ते, हम लड़ेंगे
हम चुनेंगे कठिन रस्ते जो भरे हो कंकड़ों और पत्थरों से चिलचिलाती धूप जिनपर नोचेगी देह को नींव में जिसके नुकीले काँटे बिछे हो हम लड़ेंगे युद्...
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यूँ तो अक्सर, संवेदनाएं... हावी तुमपर रहती हैं, पर, इस शाम जन्मे, अपने बेचैनी के अनल में, मुझको चुपके झोंक देना; पन्नो में सिलवट पड़े तो, शब्...
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It was 9th of may 2008. I was expecting the clouds to rain heavily and the winds to shove me hard. My anticipations and desires to look othe...
