ख्वाइशें फिर से मचलकर,
वक़्त से लड़ने लगी...
क्यूँ अक्स अपना तुझमे देखा?
मुझसे पूछा करने लगी...
अजनबी तुम आइना नही,
फिर परिचय अपना कैसा है?
आइना हंस पड़ा फिर,
शायद ...कोई मेरे जैसा है।
वक़्त कुछ पल,
मेरी मुट्ठी में थम जा,
मै अनाडी..पर तुझे तो समझ है,
लुक्का छिपी अजनबी से,
थोड़ा अनूठा थोड़ा सहज है...