Monday, May 27, 2019

और जिस समय

और जिस समय 
गुलमोहर के बौराये डाल पर बैठे
कुछ मदमस्त गौरये 
बेपरवाह होकर झूल रहे थे 
एक फुनगी से दूसरी फुनगी पर

और जिस समय
किसी पिता की आँखें भर आयी थी 
जब उसके नवजात शिशु ने 
अपनी नन्ही उँगलियों से
उसकी उँगलियों को थामा था

और जिस समय
सब्ज़ पहाड़ों के आँगन में
नदियों से तराशे गए किनारों पर
फुदक रहे थे सफ़ेद ऊन से ढके मेमने 
और दौड़ रहे थे पुष्ट घोड़े

और जिस समय
अपने औलादों से कई मीलों दूर 
बंजर सरहदों पर बने टीलों में 
अगली गोली का इंतज़ार करता सैनिक 
अपने घर वालों को याद कर रहा था

और जिस समय
बाढ़ में फ़सल उजड़ने के बाद
मातम मनाते माँ बाप 
अपने बच्चों को भूखे पेट लेटाकर 
रात की लोरियाँ सुना रहे थे

और जिस समय
विरह की वेदना में 
फूट फूट कर रोता हुआ प्रेमी 
अपनी प्रेमिका को आखिरी अलविदा कह कर 
अचेत होकर गिर पड़ा था

और जिस समय
मैं और तुम उलझे थे 
दुनिया और समाज के वकवास में

उसी समय,
यही निर्दयी समय
निगल रहा था मेरा एक हिस्सा 
हमेशा हमेशा के लिए

सुनो,
गुड़हल की वो टहनी थी ना? 
जो पिछले तीनों मौसम से 
अवसाद में झूल रही थी 
उसके जर्जर जोड़ों पर 
हरी फ़ुनगी यूँ निकली है 
जैसे स्कूल के रिक्शा पर 
लटक के बच्चे जाते हैं 
लटक के बच्चे आते हैं

Tuesday, September 18, 2018

लिखो

लिखो तो ख़ुद को खोल कर लिखो 
सतहें छिल कर लिखो, 
आत्मा निचोड़ कर लिखो  
ढकोसले से भरी दनियादारी पर लिखो
तरस आ जाये तो लाचारी पर लिखो 

प्रेम को प्रेम लिखो
दर्द को दर्द लिखो
चाह को चाह लिखो  
घुटन को घुटन लिखो  

भीड़ में भरी उबासी पर लिखो 
हारे हुए मुहब्बत की उदासी पर लिखो 
लालच में डूबे समाज पर लिखो 
जोंक की तरह खून चूसते रिवाज़ पर लिखो 

लिखो तो यूँ लिखो कि 
लिखने वाले भी बस तुम, 
पढ़ने वाले भी बस तुम; 
लिखो कि सुई की तरह लिखो 
जो मवाद से भरे घाव को एक बार में फोड़ दे  

Saturday, September 08, 2018

वक़्त बीता, उम्र बीती और कुछ यूँ हुआ
भीड़ से बचते बचाते भीड़ सा मैं हो गया

Saturday, August 04, 2018

छतें टपक रही हैं
दीवारों में दरार है
पुरानी-नयी इमरतों का ढांचा
हमारी रीढ़ सा कमज़ोर
और बेकार है

गुज़रे हुए हादसे पर विचार कर रहे हैं
आने वाले हादसे का इंतज़ार कर रहे हैं
आँख, मुँह, कान बंद कर लिया है,
नए हादसे को तैयार कर रहे हैं|

किताबें फाड़ कर हथियार भर रहे हैं
भीड़ में भीड़ बनकर घास चार रहे हैं
पुरानी पट्टियों को धो धो कर
नए घाव का उपचार कर रहे हैं|

Sunday, June 24, 2018

Ugly

लोहा, लक्कड़, ताला, चक्कर
घिच-पिच कर के बैठा है
बाहर से चमचम करता है
दिल अंदर से ugly है

मौसम, पानी, सात समंदर
गलियों गलियों घूमा है
अपनी हार पे रोया है
जीत पे हुआ smugly है

टांका, फांका, रफ़ू, सिलाई
कोने कोने फैले हैं
आधे किस्से सच हैं इसके
आधी कोशिश नकली है 

Monday, May 14, 2018

बेतुकी बातें

आज कुछ बेतुकी बातें करते हैं
पंछियों की, बादलों की
बर्फ़ की, समंदर की
बिस्तर की तरह फैले हुए हरे मैदानों की
सुस्त पहाड़ों की, अलसाए रेगिस्तानों की

उस पेड़ की,
जिसकी पत्तियां
बारिशों में सब कुछ उतारकर
सूफ़ी संतों की तरह
मदमस्त गोल गोल घूमते जाती हैं

उस मासूम बच्चे की,
जिसकी आँखें
अजनबियों को थोड़ी देर ताकती हैं
फिर अपनी जादुई कहानियों का
हिस्सा बना लेती हैं

आज कुछ बेतुकी बातें करते हैं
रोमियो की, जूलियट की
राज की, सिमरन की
ट्रेन से उतरती हुई उस लड़की की
जिसने पीछे वाली सीट पर बैठे हुए लड़के को
पहली बार देखा था
आँखें मिली थी, आँखें झुकी थी
बातें शुरू होने के पहले
लड़की का स्टॉप आ गया था

आज कुछ बेतुकी बातें करते हैं
उस प्रेमिका की,
जिसने अपने प्रेमी से बिछड़ने से पहले
उसका नाम
अपने हाथों पर गुदवा लिया था
और अपना नाम भूल गयी थी
उस प्रेमी की
जिसे अभी भी इंतज़ार है
अपनी प्रेमिका का,
जिससे आख़िरी बार मिलने से पहले
उसने फिर से मिलने का वायदा किया था

आज कुछ बेतुकी बातें करते हैं
सड़कों की, फुटपाथों की
उजड़े स्टेशन पर लटके हुए
बेजान बीमार प्लेटफॉर्मों की
उस ग़रीब बच्चे की
जिसकी पढ़ाई
शर्ट, पैंट, जूते, टाई पहनकर
स्कूल जाते हुए दुसरे बच्चों को देखकर
शुरू होती है
और स्कूल से उन्हें आते देख कर
ख़त्म भी हो जाती है

उस माँ की
जिसके कमर पर
उसके शराबी पति के बेल्ट का निशान है
और उसकी बहू के चेहरे पर
उसके शराबी बेटे के थप्पड़ का निशान
इंतज़ार कर रहा है

आज कुछ बेतुकी बातें करते हैं
maturity वाली बातें कल कर लेंगे

और जिस समय

और जिस समय  गुलमोहर के बौराये डाल पर बैठे कुछ मदमस्त गौरये  बेपरवाह होकर झूल रहे थे  एक फुनगी से दूसरी फुनगी पर और जिस समय किसी पिता...