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Thursday, May 21, 2009

समाज















तुम,
मैं,
और बीच में,
आधे चाँद की ख्वाइश;
टेढ़ी मेढ़ी सच्चाई;
विचारों के विवाद;
लेकिन,
बस,
आधी रोटी की हकीकत।

तुम,
मैं,
और बीच में,
वही सड़क,
शाश्वत चलती हुई।

तुम थकते नही,
मैं पार करना नही चाहता।

जब थक जाऊंगा,
साँसें फ़ूल जाएँगी,
ज़ज्बा ख़त्म हो जाएगा,
उस पार आकर,
मैं भी,
तुम बन जाऊंगा...

Saturday, May 09, 2009

तस्वीर

कल देर तक,
चुपचाप सिमट कर बैठा रहा,
मैं आँगन में अपने;

हलकी सी मदहोशी थी,
और मीठी सी एक बेचैनी,
चाहत और मुस्कराहट की लुक्काछिपी,
और लफ़्ज़ो की खिचातानी।

शायद,
तेरे एहसास के ठंडे छीटें पड़े थे,
और रेशम के कुछ शब्द गिरे थें,
रूह पर मेरे।

सर्द धुंध का सफ़ेद परदा,
और उस पार तुम;
कभी अजनबी और कभी पुरानी पहचान वाली,
दिख रही थी...

Saturday, March 21, 2009

हर शाम, एक गुमनाम चिडिया


हर शाम,
एक गुमनाम चिड़िया,
किसी नए फ़लक तक उड़ान के पश्चात्, घोसले में लौटती थी,
नन्ही उँगलियों से टाईपराइटर पर फुदक कर,
कुछ नए शब्द खोजती थी।

मैंने पढ़ा, सुना और तस्वीरों में देखा है,
ये दुनिया,
जिंदगी की तरह गोल, बिल्कुल गोल दिखती है;
तुम बहुत तेज़ हा धीरे चलोगे,
वापस वहीँ पहुँच जाऊगे।

शब्दों के मेले से चिड़िया,
नए रिश्ते, नई स्याही लाती थी,
नन्ही उँगलियों में सपने दबाकर,
टाईपराइटर पर फुदकती,
अपने आँगन में, स्नेह का चादर बिछाती थी।

ये बादल भी, कितने पागल होते हैं;
मांग कर और छीन कर, कतरा कतरा पानी का,
दूर देश से लाते हैं;
प्यासी धरती को देख तड़पता,
पल भर में बह जाते हैं।

टाईपराइटर के नए अक्षर,
नई स्याही, नया पेपर
नए बहने, नए विचार,
नई रचना पर वही आधार...

हर शाम एक गुमनाम चिड़िया,
वही धुन लिख जाती थी,
फुदक कर फिर टहनियों पर,
प्रियतम को सुनती थी।

हम चुनेंगे कठिन रस्ते, हम लड़ेंगे

हम चुनेंगे कठिन रस्ते जो भरे हो कंकड़ों और पत्थरों से  चिलचिलाती धूप जिनपर नोचेगी देह को  नींव में जिसके नुकीले काँटे बिछे हो  हम लड़ेंगे युद्...