Tuesday, May 10, 2011

टुकड़े

ज़िंदगी

एक बौरायी सी ख़ुशबू है
कभी भटकने से रोक लेती है,
और कभी भटकने को मज़बूर कर देती है.

सुबह 

सूरज जैसे wrapper में लिपटा हुआ था
और उसके खुलते ही
हम 'ट्रेक्टर' पर बैठ कर,
सुबह की फ़सल काटने चल पड़े 

बहस

तुम मुझपर चीख़ लो,
मैं तुमपर चीख़ लेता हूँ
पत्थरों को रगड़कर उजाला तो न हुआ
अपनी बहस से ही सही,
कहीं आग लगायी जाए

बस 'कंडक्टर'

मैं कुछ महीने भूखा भी सो लेता हूँ
पर सच्चाई जब पेट से लड़ने लगती है,
मुसाफ़िरों के सपनो को रस्ता दिखाना पड़ता है

इश्क़

मैं सवाल ज़वाब, हिसाब किताब नहीं समझता
तुम्हारा ख्याल जब भी आता है 
खुले आकाश में बिखरे तारों की तरह
गंगा की स्वक्ष लहरों में, 
चुपचाप अपनी चमक छोड़ जाता है.

Saturday, April 16, 2011

समाज

अखब़ार का एक टुकड़ा
बाहर से जला हुआ,
और राख़ वाली परिधि के दरमयां
सिर्फ़ तुम्हारा ज़िक्र.

हुमाद की वही खुशबू,
जिसका कोई आकर नहीं, 
जिसकी कोई दिशा नहीं;
ठंडी आवाज़ में बजती घंटियों सा चमकता है,
दीया और पुष्प जैसा नदियों में बिख़र जाता है.

हम घोसला बनाते हैं
जिसपर,
कभी चाँद लटकता है, कभी शराब की बोतलें
कभी वहां चूजों के मासूम सवाल गूंजते हैं,
और कभी दरिंदगी और लालच भरी चीखें.

दीवार के एक कोने पर चढ़कर,
दूसरे कोने पर आहटों का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं सभी,
वज़ह और बहाने अलग हो शायद.

मैं भी समाज हूँ.

Friday, April 08, 2011

Thursday, March 31, 2011

उफ्फ़

तुम कभी हो
इश्क़ का कतरा,
और कभी आवारगी
तुम कभी फ़िरदौस की सूरत
और तुम कभी हो ज़िंदगी
दीवानों का क्या कोई जिस्म
कोई मज़हब नहीं होता है?

तुम कभी चांदनी को फूटपाथ समझकर सो जाते हो,
तुम कभी खुशबू बनकर 
पलकों में भी खों जाते हो
दीवानों का क्या कोई घर,
कोई शहर नहीं होता है?

Wednesday, March 02, 2011

नाव

वहां, 
उन अलसाए रस्तों के किनारे 
सुस्त सा दरिया है कोई. 
कभी बचपन में मैंने 
वहां कागज़ की इक नाव डाली थी. 
सुना है कि, 
आज भी वह नाव वहां मद मस्त बहती है.

कहीं टूटे से छज्जों पर,
परिंदे जब घोसलों में 
अधखुली आँखों से अंगराई लेते हैं
कहीं बिस्तर की सिलवट में 
कुछ ख़्वाब करवटें लेते हैं 
मुझे लगता है कि फिर से नाव बनकर 
नदी में मद मस्त हो जाऊं.

Friday, February 25, 2011

बेवजह


कोई ऐसे भी तो हमसे मिले कभी कभी,
कि बेवजह ही उनसे मुहब्बत होती जाए
मौसम में बेताबी के छीटें कुछ एक गिरें
शरारत हमारी सारी शराफ़ात होती जाए

ख्यालों की हर कशिश, दुआओं में हो कबूल
ख्वाबों की ऐसी कभी गुज़ारिश होती जाए
कोई ऐसे भी तो हमसे मिले कभी कभी,
कि बदनामी हमारी शोहरत होती जाए


हम चुनेंगे कठिन रस्ते, हम लड़ेंगे

हम चुनेंगे कठिन रस्ते जो भरे हो कंकड़ों और पत्थरों से  चिलचिलाती धूप जिनपर नोचेगी देह को  नींव में जिसके नुकीले काँटे बिछे हो  हम लड़ेंगे युद्...