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Tuesday, May 10, 2011

टुकड़े

ज़िंदगी

एक बौरायी सी ख़ुशबू है
कभी भटकने से रोक लेती है,
और कभी भटकने को मज़बूर कर देती है.

सुबह 

सूरज जैसे wrapper में लिपटा हुआ था
और उसके खुलते ही
हम 'ट्रेक्टर' पर बैठ कर,
सुबह की फ़सल काटने चल पड़े 

बहस

तुम मुझपर चीख़ लो,
मैं तुमपर चीख़ लेता हूँ
पत्थरों को रगड़कर उजाला तो न हुआ
अपनी बहस से ही सही,
कहीं आग लगायी जाए

बस 'कंडक्टर'

मैं कुछ महीने भूखा भी सो लेता हूँ
पर सच्चाई जब पेट से लड़ने लगती है,
मुसाफ़िरों के सपनो को रस्ता दिखाना पड़ता है

इश्क़

मैं सवाल ज़वाब, हिसाब किताब नहीं समझता
तुम्हारा ख्याल जब भी आता है 
खुले आकाश में बिखरे तारों की तरह
गंगा की स्वक्ष लहरों में, 
चुपचाप अपनी चमक छोड़ जाता है.

Wednesday, March 02, 2011

नाव

वहां, 
उन अलसाए रस्तों के किनारे 
सुस्त सा दरिया है कोई. 
कभी बचपन में मैंने 
वहां कागज़ की इक नाव डाली थी. 
सुना है कि, 
आज भी वह नाव वहां मद मस्त बहती है.

कहीं टूटे से छज्जों पर,
परिंदे जब घोसलों में 
अधखुली आँखों से अंगराई लेते हैं
कहीं बिस्तर की सिलवट में 
कुछ ख़्वाब करवटें लेते हैं 
मुझे लगता है कि फिर से नाव बनकर 
नदी में मद मस्त हो जाऊं.

Sunday, February 13, 2011

इश्क़

सुबह छिटक कर,
बिस्तर में आ जाता है
सूरज का कुछ टुकड़ा;
अंगराईयां मेरी- मुट्ठी में उन्हें भर लेती हैं.

'बालकनी' में 
जब भी मिलते हैं आपस में - एक प्याली चाय की चुस्की
और, मिट्टी की सौंधी सी खुशबू;
मैं पंख लगाकर, 
हौले हौले नन्हे पत्तों सा बह लेता हूँ.

थोड़ा थोड़ा चाँद चुराकर,
लिफाफों को रंगते आये हैं - 'तुम और मैं'

लेकिन,
पतझड़ की किसी सांझ को जब,
लालटेन नहीं जलता है, और 
चाहतों की चीख़ नाकाम होती है
हम, राख़ के जैसे बिख़र जाते हैं.
सुलगती जाती है बेचारी ज़िंदगी,
और,
किसी बेनाम चौराहे पर बदनाम होती है.

चलो, 
ओढ़कर इसकी ख़ुशबू, ज़िंदगी से थोड़ा इश्क़ करते हैं,
ज़िंदगी के नाम पर मरने से पहले, ज़िंदगी जी लेते है.

Saturday, January 23, 2010

फ़ासला

मुददतों से रौशनी ख़ामोश है,
वक़्त की दरख़्त पर,
उम्मीदों की ख़रोच का नामोनिशां कंही है नहीं।
और,
शून्य सी खड़ी है वही शीशे की दीवार;
एक तरफ़ ठण्ड में ठिठुरता रहता है चाँद,
और एक तरफ़ हुक्के के धुंए में जिंदगी मदहोश है।

तुम्हारी रोशनदानी में जब मैं झांकता हूँ,
दिखता है वही चराग़
बेचैन, इंक़लाब के जिदद में,
फड फडाता रूह मेरी ताकता है।

जब फुर्सत मिले,
तुम, तुम्हारे चाहने और जानने वाले सारे लोग
एक छत के नीचे जमा होकर,
तब तक...
हँसते रहना, बातें करना, रोते रहना, ख़ूब लड़ना,
जब तक सारी बेतुकी ख्वाइशें झुर्रिया बनकर चेहरे पर उभर न जाएँ;

फिर लौट जायेंगे सब अपनी गली,
और नयी सुबह,
बेरुखी जिंदगी से फ़ासला कम हो जाएगा।

हम चुनेंगे कठिन रस्ते, हम लड़ेंगे

हम चुनेंगे कठिन रस्ते जो भरे हो कंकड़ों और पत्थरों से  चिलचिलाती धूप जिनपर नोचेगी देह को  नींव में जिसके नुकीले काँटे बिछे हो  हम लड़ेंगे युद्...