Wednesday, January 06, 2010

Old Memories

This is a link to an old song written and directed by me. Music was composed by Amrit and sung by Vaibhav (college ka room mate :) ). Most of the actors are batch mates at IT BHU.

http://www.youtube.com/watch?v=mvjd91UctuM

Tuesday, January 05, 2010

सयाना चूजा घोसले से फुर्र फुर्र उड़ गया

सौंधी सौंधी खुशबू थी, हलकी हलकी बारिश,

पलकों में खिली थीं नयी नयी ख्वाइश,

होश भी था हौसला भी...

वो खुली हवा में पतंग बनकर उड़ गया...

सयाना चूजा घोसले से फुर्र फुर्र उड़ गया।

बुलबुला बनकर बहता था गलियों में,

बादलों कें काँधें पर बेलगाम छलियों सा...

लिखने निकला था अपनी दास्तान..ढूँढने आसमा का रास्ता॥

थामे जो मुश्किलों में...

आज वो..ऊँगली नहीं थीं, आचल नहीं था, लोरी नहीं थीं॥

अनजानी भीड़ में अनजाना जुड़ गया...

सयाना चूजा घोसले से फुर्र फुर्र उड़ गया।

ख्वावों के रस्ते चलकर, पगडण्डी टेढ़े चढ़कर,

यारों का एक शहर था॥

छल्लों में शाम ढलती, सुबह किसको खबर था

होठो पर टूटी फूटी सीटी...और वही jeans पुरानी,

मशाल था वो,

आँधियों में जलता गया ... चलता गया ..चलता गया

खुद को पहचानने लिए सुर नया

सयाना चूजा घोसले से फुर्र फुर्र उड़ गया।

Saturday, November 28, 2009

खोया खोया चाँद

फटे जूते,
जिंदगी को,
ठोकरों में लपेट कर,
गलियों में खो गए,

करवटें भारी भारी,
ख्वाब सारे,
बिस्तरों की सिलवटों में समेट कर,
बेफ़िकर ही सो गयें,

रात भर,
मैं जला, और जली, बेवफ़ा सिगरेट,
छल्लों की तलब में जलता रहा,
भूखा पापी पेट...सूखा भारी पेट।

खोया खोया चाँद को चूमने को,
खुशबू भरे सांझ यूँही घूमने को;
जगी फिर वही तलाश है...

नन्ही नन्ही बूंद में भीगने को,
सारी रात बेतूका चीखने को;
उतावला उदास है...

ये नोचने की चाहतें,
ये चाहतों का सिलसिला,
ये हसरतों की करवटें,
ये करवटों के दास्ताँ,

आईने में सूरतें, बिस्तरों में करवटें,
मोम बन पिघल पड़ेंगी,
रात भर,
मैं जलूँगा और बेवफ़ा सिगेरेट ...
छल्लों की तलब में जलेगा,
पापी भूखा पेट।

Friday, October 09, 2009

कल आधी रात

कल आधी रात,
इक कतरा चाँद, एक तिनका अरमां
हौले, हौले पिघलकर,
पैमाने में छलक गयें;

कल आधी रात,
इक टुकड़ा अब्र, और कुछ बिखरे तारे,
सतरंगी बनकर
मुझमे बहक गयें।

पॉकेट में थे, मेरे,
कुछ सिक्के पुराने,
और
मुट्ठी भर बटोरे, कुछ चमकीले पत्थर।
आधी विरासत बचपन से बटोरे,
कल आधी रात,
तुम्हे सौंप आया।

तेरे आधे सपने,
मेरी आधी ख्वाइश,
ओस में आधे भीगे पड़े थें।

कल
आधी रात,
एक आधी पायल, और,
आधा सा पिघला रेशम का पत्ता,
एक शाख़ की छाव में,
आधे - आधे लिपट गयें।

कल आधी रात,
आधी तेरी पलकें,
आधी मेरी सासें,
अर्श पर सजी,
इक आधी नज़्म में सिमट गयें...

Friday, September 18, 2009

बेतुके

दर्द की हँसी

वक्त के साथ साथ

मुरझा गई।


आंधी का पंजा

बहुत नुकीला था;

ज़ख्मी ढिबरी

काँप काँप कर हार गई।


झील के आंसू

बहते बहते सूख गए;

ज़ालिम पतझर,

पल्लव उसके कल नोंच गया।


तेरी चिट्ठी,

बारिश में वो पढता था ,

पिघले पन्ने अंगीठी में,

कल बुझे मिले ...


Wednesday, September 16, 2009

चोट

तुम्हारे विचारों और व्यक्तित्व पर,
जब भी
गहराई से विश्लेषण की बात उठती है,
दुनिया और भी खोखली दिखती है।

सम्भव है,
मेरी विकृत बुद्धि,
सच के दूसरे पहलू से वंचित रह जाती है,
विनाश और विध्वंश में उलझकर,
मुर्छित, हर्षित और मंद सड़ जाती है;

परन्तु,
साम्यवाद और समाजवाद का वस्त्र,
सिद्धांत और विनय का शस्त्र,
उतना ही मैला
उतना ही आधार हीन दिखता है;
जब,
किसी अपरिचित के घाव को देख,
तुम भौं सिकोड़ कर निर्माण के गीत गाते हो।

तब शायद,
विवादों और कर्तव्य के बोझ में उलझे सारे पृष्ट,
आडम्बर की परिधि में बंधी तुम्हारी दृष्टि;
मेरे स्वार्थ और निराशा की काली दुनिया के समक्ष,
फीके पड़ जाते हैं।

हम चुनेंगे कठिन रस्ते, हम लड़ेंगे

हम चुनेंगे कठिन रस्ते जो भरे हो कंकड़ों और पत्थरों से  चिलचिलाती धूप जिनपर नोचेगी देह को  नींव में जिसके नुकीले काँटे बिछे हो  हम लड़ेंगे युद्...