Friday, October 09, 2009

कल आधी रात

कल आधी रात,
इक कतरा चाँद, एक तिनका अरमां
हौले, हौले पिघलकर,
पैमाने में छलक गयें;

कल आधी रात,
इक टुकड़ा अब्र, और कुछ बिखरे तारे,
सतरंगी बनकर
मुझमे बहक गयें।

पॉकेट में थे, मेरे,
कुछ सिक्के पुराने,
और
मुट्ठी भर बटोरे, कुछ चमकीले पत्थर।
आधी विरासत बचपन से बटोरे,
कल आधी रात,
तुम्हे सौंप आया।

तेरे आधे सपने,
मेरी आधी ख्वाइश,
ओस में आधे भीगे पड़े थें।

कल
आधी रात,
एक आधी पायल, और,
आधा सा पिघला रेशम का पत्ता,
एक शाख़ की छाव में,
आधे - आधे लिपट गयें।

कल आधी रात,
आधी तेरी पलकें,
आधी मेरी सासें,
अर्श पर सजी,
इक आधी नज़्म में सिमट गयें...

Friday, September 18, 2009

बेतुके

दर्द की हँसी

वक्त के साथ साथ

मुरझा गई।


आंधी का पंजा

बहुत नुकीला था;

ज़ख्मी ढिबरी

काँप काँप कर हार गई।


झील के आंसू

बहते बहते सूख गए;

ज़ालिम पतझर,

पल्लव उसके कल नोंच गया।


तेरी चिट्ठी,

बारिश में वो पढता था ,

पिघले पन्ने अंगीठी में,

कल बुझे मिले ...


Wednesday, September 16, 2009

चोट

तुम्हारे विचारों और व्यक्तित्व पर,
जब भी
गहराई से विश्लेषण की बात उठती है,
दुनिया और भी खोखली दिखती है।

सम्भव है,
मेरी विकृत बुद्धि,
सच के दूसरे पहलू से वंचित रह जाती है,
विनाश और विध्वंश में उलझकर,
मुर्छित, हर्षित और मंद सड़ जाती है;

परन्तु,
साम्यवाद और समाजवाद का वस्त्र,
सिद्धांत और विनय का शस्त्र,
उतना ही मैला
उतना ही आधार हीन दिखता है;
जब,
किसी अपरिचित के घाव को देख,
तुम भौं सिकोड़ कर निर्माण के गीत गाते हो।

तब शायद,
विवादों और कर्तव्य के बोझ में उलझे सारे पृष्ट,
आडम्बर की परिधि में बंधी तुम्हारी दृष्टि;
मेरे स्वार्थ और निराशा की काली दुनिया के समक्ष,
फीके पड़ जाते हैं।

Saturday, August 29, 2009

स्वार्थी

उस रात,
गोद में उठाकर,
अपने बच्चे से अटपटी बातें करती माँ की आँखों में,
शायद,
मैंने वैसा ही कुछ देखा था,
जैसा आज,
चाय की चुस्कियों के संग,
अपने पुरानी यादों पर खिलखिलाते,
और,
बचे खुचे दांतों के बीच,
मोर की तरह फडफडाते
उस बुजुर्ग के होठो में देखा होगा।

हर बार,
निस्वार्थ बहते
इन झरनों को,
मैं अपनी कल्पनाओ में कैद करना चाहता हूँ;
और हर बार,
ऐसा करते ही,
मैं थोड़ा और स्वार्थी बन जाता हूँ।

Friday, August 28, 2009

इंतज़ार

हर रात,
तुम्हारी आहटों का इंतज़ार रहता है;

सोचता हूँ,
मेरी पलकें
थक कर,
जब अलसाई बाती की तरह बुझ जायेंगी,
तुम,
चुपके से आकर,
मेरे शब्दों को जूठा कर दोगी।

और सुबह,
धूप की छन छन
गुदगुदाकर,
जब मुझे चिढ़ाने को बेताब हो जाएँ;
मैं टूटे आवारा पत्तों की तरह,
फ़ुर्सत से,
मदहोशी में हौले हौले बहता हुआ,
सुबह से शाम गुज़र दूँ;

और,
मेरे नज्मों की खुशबू,
वादियों में सहमे बादलों की तरह,
आहिस्ता आहिस्ता फैलने लगे...

Saturday, August 08, 2009

इस रात वक्त क्यूँ थम गया है?

बूझते चिरागों की बेबसी में,
ख्वाइश का साया खोने लगा है।
किताबों की दुनिया का बेखौफ़ ज़ज्बा,
बूझी राख़ बन कर सोने लगा है।

अंधेरे में लिपटे आइनों की हँसी से,
यादों की तस्वीर जलने लगी है,
मैखाने में छिप के रोने गया था,
शहर में मातम भी बिकने लगा है।

इस रात वक्त क्यूँ थम गया है?
सुबह तक मैं भी ढल पडूंगा,
बासी रोटी निगलकर भूख मर गई अगर,
सुनसान गलियों में चल पडूंगा।

Saturday, July 18, 2009

रिश्तें

चाँद जब
सर्द रातों में,
अंगराई
लेने के बहाने,
मेरे जिस्म पर,
ओस की अलसाई बूंदे
छोड़ आता है;
मेरी रूह,
उस मीठे एहसास में,
बेचैन होकर उलझ जाती है।

रिश्तों की सरहदें,
वक्त की तरह
बेरहम होती हैं।
जिन्हें लांघने के बाद,
लौटना मुमकिन नहीं;
और,
सरहद के पीछे छूटी बस्तीयाँ,
मध्धम मध्धम पिघलकर
यादों में सिमट कर रह जातीं हैं...

हम चुनेंगे कठिन रस्ते, हम लड़ेंगे

हम चुनेंगे कठिन रस्ते जो भरे हो कंकड़ों और पत्थरों से  चिलचिलाती धूप जिनपर नोचेगी देह को  नींव में जिसके नुकीले काँटे बिछे हो  हम लड़ेंगे युद्...