Saturday, May 01, 2010
अट्ठन्नी
जब,
चोकलेट के लालच में,
अलमारी से मैंने अट्ठन्नी चुरायी थी;
पकड़ा ना जाऊ,
इस डर से,
हडबडाहट में घर के पीछे लगे बरगद में,
उसे मैं गाड़ आया था.
दौड़ भाग और कशमकश में,
अट्ठन्नी के साथ साथ,
बरगद ने मेरी रूह का एक टुकड़ा भी निगल लिया था, शायद
और,
ज़िस्म पर छोड़ दिया एक ख़रोच.
आज बरगद बड़ा हो गया है;
अपनी शाख से, ढक लेता है सूरज को.
सूरज घूमता तो है, लेकिन
हर पहर रात जैसी ही होती है.
जब भी नए चोकलेट खाने की कोशिश करता हूँ,
अँधेरा दबोचने को दौड़ता है
और मेरे रूह की कीमत,
उस अट्ठन्नी से सस्ती महसूस होने लगती है.
बचपन का खुरेंचा हुआ वह घाव,
आज भी इंतज़ार कर रहा है,
गर्द की परतों का;
इस बार मैं अट्ठन्नी चुराकर मलहम नहीं खरीदूंगा.
Saturday, January 23, 2010
फ़ासला
वक़्त की दरख़्त पर,
उम्मीदों की ख़रोच का नामोनिशां कंही है नहीं।
और,
शून्य सी खड़ी है वही शीशे की दीवार;
एक तरफ़ ठण्ड में ठिठुरता रहता है चाँद,
और एक तरफ़ हुक्के के धुंए में जिंदगी मदहोश है।
तुम्हारी रोशनदानी में जब मैं झांकता हूँ,
दिखता है वही चराग़
बेचैन, इंक़लाब के जिदद में,
फड फडाता रूह मेरी ताकता है।
जब फुर्सत मिले,
तुम, तुम्हारे चाहने और जानने वाले सारे लोग
एक छत के नीचे जमा होकर,
तब तक...
हँसते रहना, बातें करना, रोते रहना, ख़ूब लड़ना,
जब तक सारी बेतुकी ख्वाइशें झुर्रिया बनकर चेहरे पर उभर न जाएँ;
फिर लौट जायेंगे सब अपनी गली,
और नयी सुबह,
बेरुखी जिंदगी से फ़ासला कम हो जाएगा।
Monday, January 11, 2010
Something Random
Wednesday, January 06, 2010
Old Memories
http://www.youtube.com/watch?v=mvjd91UctuM
Tuesday, January 05, 2010
सयाना चूजा घोसले से फुर्र फुर्र उड़ गया
सौंधी सौंधी खुशबू थी, हलकी हलकी बारिश,
पलकों में खिली थीं नयी नयी ख्वाइश,
होश भी था हौसला भी...
वो खुली हवा में पतंग बनकर उड़ गया...
सयाना चूजा घोसले से फुर्र फुर्र उड़ गया।
बुलबुला बनकर बहता था गलियों में,
बादलों कें काँधें पर बेलगाम छलियों सा...
लिखने निकला था अपनी दास्तान..ढूँढने आसमा का रास्ता॥
थामे जो मुश्किलों में...
आज वो..ऊँगली नहीं थीं, आचल नहीं था, लोरी नहीं थीं॥
अनजानी भीड़ में अनजाना जुड़ गया...
सयाना चूजा घोसले से फुर्र फुर्र उड़ गया।
ख्वावों के रस्ते चलकर, पगडण्डी टेढ़े चढ़कर,
यारों का एक शहर था॥
छल्लों में शाम ढलती, सुबह किसको खबर था
होठो पर टूटी फूटी सीटी...और वही jeans पुरानी,
मशाल था वो,
आँधियों में जलता गया ... चलता गया ..चलता गया
खुद को पहचानने लिए सुर नया
सयाना चूजा घोसले से फुर्र फुर्र उड़ गया।
Sunday, December 27, 2009
Saturday, November 28, 2009
खोया खोया चाँद
जिंदगी को,
ठोकरों में लपेट कर,
गलियों में खो गए,
करवटें भारी भारी,
ख्वाब सारे,
बिस्तरों की सिलवटों में समेट कर,
बेफ़िकर ही सो गयें,
रात भर,
मैं जला, और जली, बेवफ़ा सिगरेट,
छल्लों की तलब में जलता रहा,
भूखा पापी पेट...सूखा भारी पेट।
खोया खोया चाँद को चूमने को,
खुशबू भरे सांझ यूँही घूमने को;
जगी फिर वही तलाश है...
नन्ही नन्ही बूंद में भीगने को,
सारी रात बेतूका चीखने को;
उतावला उदास है...
ये नोचने की चाहतें,
ये चाहतों का सिलसिला,
ये हसरतों की करवटें,
ये करवटों के दास्ताँ,
आईने में सूरतें, बिस्तरों में करवटें,
मोम बन पिघल पड़ेंगी,
रात भर,
मैं जलूँगा और बेवफ़ा सिगेरेट ...
छल्लों की तलब में जलेगा,
पापी भूखा पेट।
हम चुनेंगे कठिन रस्ते, हम लड़ेंगे
हम चुनेंगे कठिन रस्ते जो भरे हो कंकड़ों और पत्थरों से चिलचिलाती धूप जिनपर नोचेगी देह को नींव में जिसके नुकीले काँटे बिछे हो हम लड़ेंगे युद्...
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यूँ तो अक्सर, संवेदनाएं... हावी तुमपर रहती हैं, पर, इस शाम जन्मे, अपने बेचैनी के अनल में, मुझको चुपके झोंक देना; पन्नो में सिलवट पड़े तो, शब्...
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Y - What?... Philosophy ! You mean to say, you spent your whole graduation sitting near by the banks of Ganges, intoxicated in some damn fu...
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It was 9th of may 2008. I was expecting the clouds to rain heavily and the winds to shove me hard. My anticipations and desires to look othe...
