Self Composed Video
Monday, August 01, 2011
Tuesday, July 12, 2011
कभी कभी
Part 1
बंजारे अब्र की पहले - मंजिल ना राहें थीं
तुम्हारे लफ्ज़ सुनकर जैसे ठहर गया.
Part 2
मौसम का एक टुकड़ा बड़ा सर्द हुआ करता था,
दीवारों को भी कभी मीठा दर्द हुआ करता था.
तुम्हारे ज़िक्र की बारिश में रुह तर गयी
काशी घाट में गंगा हो जैसे - भर गयी. बंजारे अब्र की पहले - मंजिल ना राहें थीं
तुम्हारे लफ्ज़ सुनकर जैसे ठहर गया.
Part 2
मौसम का एक टुकड़ा बड़ा सर्द हुआ करता था,
दीवारों को भी कभी मीठा दर्द हुआ करता था.
दिन रात समंदर में उठती, बेचैनी की लहरें थीं,
प्यासी लहरों का भी कोई हमदर्द हुआ करता था.
इक चिड़िया,
ख्वाइशों की संदूक पर हौले से आ जाती थी,
पिछले बारिश जिस संदूक का चेहरा गर्द हुआ करता था.
प्यासी लहरों का भी कोई हमदर्द हुआ करता था.
इक चिड़िया,
ख्वाइशों की संदूक पर हौले से आ जाती थी,
पिछले बारिश जिस संदूक का चेहरा गर्द हुआ करता था.
Tuesday, May 10, 2011
टुकड़े
ज़िंदगी
एक बौरायी सी ख़ुशबू है
कभी भटकने से रोक लेती है,
और कभी भटकने को मज़बूर कर देती है.
सुबह
सूरज जैसे wrapper में लिपटा हुआ था
और उसके खुलते ही
हम 'ट्रेक्टर' पर बैठ कर,
सुबह की फ़सल काटने चल पड़े
बहस
तुम मुझपर चीख़ लो,
मैं तुमपर चीख़ लेता हूँ
पत्थरों को रगड़कर उजाला तो न हुआ
अपनी बहस से ही सही,
कहीं आग लगायी जाए
बस 'कंडक्टर'
मैं कुछ महीने भूखा भी सो लेता हूँ
पर सच्चाई जब पेट से लड़ने लगती है,
मुसाफ़िरों के सपनो को रस्ता दिखाना पड़ता है
इश्क़
मैं सवाल ज़वाब, हिसाब किताब नहीं समझता
तुम्हारा ख्याल जब भी आता है
खुले आकाश में बिखरे तारों की तरह
गंगा की स्वक्ष लहरों में,
चुपचाप अपनी चमक छोड़ जाता है.
Wednesday, April 20, 2011
Saturday, April 16, 2011
समाज
अखब़ार का एक टुकड़ा
बाहर से जला हुआ,
और राख़ वाली परिधि के दरमयां
सिर्फ़ तुम्हारा ज़िक्र.
हुमाद की वही खुशबू,
जिसका कोई आकर नहीं,
जिसकी कोई दिशा नहीं;
ठंडी आवाज़ में बजती घंटियों सा चमकता है,
दीया और पुष्प जैसा नदियों में बिख़र जाता है.
हम घोसला बनाते हैं
जिसपर,
कभी चाँद लटकता है, कभी शराब की बोतलें
कभी वहां चूजों के मासूम सवाल गूंजते हैं,
और कभी दरिंदगी और लालच भरी चीखें.
दीवार के एक कोने पर चढ़कर,
दूसरे कोने पर आहटों का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं सभी,
वज़ह और बहाने अलग हो शायद.
मैं भी समाज हूँ.
Friday, April 08, 2011
Thursday, March 31, 2011
उफ्फ़
तुम कभी हो
इश्क़ का कतरा,
और कभी आवारगी
तुम कभी फ़िरदौस की सूरत
और तुम कभी हो ज़िंदगी
दीवानों का क्या कोई जिस्म
कोई मज़हब नहीं होता है?
तुम कभी चांदनी को फूटपाथ समझकर सो जाते हो,
तुम कभी खुशबू बनकर
पलकों में भी खों जाते हो
दीवानों का क्या कोई घर,
कोई शहर नहीं होता है?
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