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Saturday, August 21, 2010

शहर

कुछ शौक को दफ़न करके, नया शौक पाल लेते हैं. 
कुछ ज़ख्म को छिपाकर, नया ज़ख्म डाल लेते हैं.
इस शहर का सुनसान कँही अपनी गुफ़्तगू सुन न लें,
चलो संदूक से नयी शक्ल, नयी पोशाक निकाल लेते हैं. 


हर शख्स का चेहरा मिलता है हुबहू,
हर ख्वाइशों की चादर का रकबा भी एक है,    रकबा - Area
कुछ सरफिरों ने चंद आसमानी तस्वीरें खींच ली,
इस शहर में आइना नहीं बिकता, 
बाज़ार में खीचें गए तस्वीरें बिकते हैं. 


आँखों में बेबसी की झलक, 
माथे पर दरारें क्यूँ हैं,
इस नस्ल में आख़िर 
सभी थके-हारे से क्यूँ हैं,  
ये रंगीन शहर कभी बुझता ही नहीं है. 
हर लाश के दरमयां, ये दीवारें क्यूँ हैं. 

Friday, June 05, 2009

तेरे किस्से भी ख़रीदे थे रे बन्दे













अंधी
गलियों में हज़ारों,
प्यासे चूल्हे जलते हैं;
भूखे कुँए में सभी बेआबरु घुट कर मरते है।

इंसान की फ़ितरत बता कर,
भीख को आदत सुना कर,
तुमने उनको ठुकरा दिया था,
तुमने सब झूठला दिया था।

तेरे किस्से भी ख़रीदे थे रे बन्दे,
तेरे ही दरबार से;

हकीक़त की आंधी में जब,
असूलो का चोला,तेरा ही
चूभा था तुझे और,
अंधेरे कुँए में,
डुबकी लगाकर,
तुम,
दुनिया की महफ़िल में शामिल हुए थे।

बेच आया,
तेरे सारे किस्से,
वक्त के बाज़ार में...

हम चुनेंगे कठिन रस्ते, हम लड़ेंगे

हम चुनेंगे कठिन रस्ते जो भरे हो कंकड़ों और पत्थरों से  चिलचिलाती धूप जिनपर नोचेगी देह को  नींव में जिसके नुकीले काँटे बिछे हो  हम लड़ेंगे युद्...