Saturday, May 05, 2012

चूहों को ज़हर देना ज़रूरी है

चूहों को ज़हर का डर ना हो तो,
क्रांति और इंक़लाब की बातें करने लगते हैं;
अचानक से किसी एक चूहे को
आज़ादी की भूख़ लग जाती है,
और उसकी भूख़ ख़ा जाती है, बाकी चूहों की सोच को


Physics जितना mass पर act करता है,
उतना ही सोच पर भी;
श्रृष्टि हर श्रृजन को अंडाकार बना देती है
ग्रहों को देखा है,
oval होते जाते हैं, और oval रस्ते पर घूमते जाते हैं;
सोच का भी वही खेल है.


एक चूहे की इन्क़लाबी सोच,
हज़ार चूहों को gravitationally pull करती है;
हवस का wave resonate करता है ,
फिर सब कुछ oval ही oval;
चूहे इन्क़लाबी हो जाते हैं.


Democracy में ज़हर देना जरूरी है
एक सिक्का, 
धीरे धीरे aluminium वाले पत्तों को पिघलाता रहता है 
hydrogen sulphate की तरह 
aluminium नहीं रहेगा, तो कटोरा कौन बनाएगा
भूख़ लगेगी तो क्रांति पनपेगी 
चूहों को ज़हर देना ज़रूरी है 

Wednesday, April 25, 2012

लड़खड़ाने लगा हूँ

तुम्हारी तस्वीर, आज भी बस, बटुए में  महफूज़ है
तुम्हारे हमशक्ल से गुज़ारा चला लेता हूँ आज कल 

ज़िन्दगी कुछ देर और ऊँगली पकड़ लेना; लड़खड़ाने लगा हूँ  

Saturday, April 07, 2012

All in all we are just another brick in the wall

चूल्हा जलता है,
भूख़ नहीं मरती 
बड़े बड़े दीवारों के पीछे
काली मैली परछाईयाँ हैं
सच का झूटा बुलबुला
बहुत सारे सच का खून पीकर बड़ा बनता है
 दो वक़्त की रोटी, एक पहर का दाल
All in all we are just another brick in the wall

धर्म और जाति का जन्म
सुरक्षा के लिए हुआ होगा
कभी शायद 
अब दीवारों पर सजाने के काम आता है
तुम धर्म और जाति बेचने आते हो,
बदले में मुझे ख़रीद जाते हो 

मुल्क की भूख़
और तुम्हारे चाय की चुस्की
कब शांत होगी ये ख़ूनी भूख़
कब थमेगा ये बवाल
All in all we are just another brick in the wall

Saturday, March 31, 2012

एक टुकड़ा भारत

विचार हूँ, विस्तार हूँ
द्वंद हूँ, विकार हूँ
स्वयं का हूँ रक्षक, स्वयं का संहार हूँ

मैं भी भारत हूँ

पिता हूँ
घर का पेट पालने के लिए,
अनंत बन जाता हूँ
और जिस दिन,
तुम आधे पेट सो जाते हो
तुम मुझे शुन्य बना देते हो;

शुन्य हूँ, अनंत हूँ
मृत स्थिर, ज्वलंत हूँ
तुम्हारा बंधक, तुमसे ही स्वतंत्र हूँ 

मैं भी भारत हूँ

बाबरी में जलता हूँ, 
गोधरा में जलता हूँ
मुंबई की गोलियां सहकर
कश्मीर में पिघलता हूँ
बुझी राख़ पर रखी ठंडी चिता हूँ
मैं माँ का जला हुआ आँचल
मैं झुग्गी संभालता हुआ पिता हूँ 

मैं भी भारत हूँ

मेरी अभिव्यक्ति भी तुम्हारे विचारों की कठपुतली है

उत्सव हूँ, संस्कृति हूँ
जनमत हूँ, राजनीति हूँ 
तुम्हारा बिध्वंश, तुम्हारी ही कृति हूँ

मैं भी भारत हूँ

Sunday, March 25, 2012

धर्म

अस्तित्व का भय,
बहुत मौलिक है;
उतना ही मौलिक
जितना, उसपर लिपा पोती करके 
धर्म का शंख बजाना

अगरबत्तियों और हुमाद की खुशबू से
रक्त चाप में संतुलन आता है.
मात्र संतुलन
एक संतुलन के लिए बहुत सारा संतुलन बिगड़ना
यह कौन सा धर्म है 

Wednesday, February 15, 2012

वक़्त

वक़्त
धीरे धीरे
ज़िन्दगी के पन्नों को घोलता रहता है
बढ़ता रहता है...
पीछे पलटकर देखता हूँ तो
इतिहास? सब इतिहास? बस इतिहास?

चुपके चुपके
कितनी रातें
ढिबरी में जल जाती हैं

धीरे धीरे सारी यादें,
किस्सों में ढल जाती हैं


यादों पर कभी हँसता हूँ,
यादों पर कभी रोता हूँ
फ़िर से जब भी,
यादों वाली गलियों में,
बचपन मैं खोजने बढ़ता हूँ
इतिहास! सब इतिहास! बस इतिहास!

हम चुनेंगे कठिन रस्ते, हम लड़ेंगे

हम चुनेंगे कठिन रस्ते जो भरे हो कंकड़ों और पत्थरों से  चिलचिलाती धूप जिनपर नोचेगी देह को  नींव में जिसके नुकीले काँटे बिछे हो  हम लड़ेंगे युद्...