Monday, November 21, 2011

Why this kolaveri kolaveri kolaveri di

When mind is without Fear
and choices are for free..
Then why this kolaveri kolaveri kolaveri di

कोई States से अनजान हैं, कोई status में परेशान है
कल तक,
भ्रष्टाचार पर मिटने वाला Facebook Generation,
आज Sunny Leon पर क़ुर्बान है

वही मुल्क़, जो चाँद पड़ोसने की ख्वाईशें रखता था
लोग कहते हैं - आज culturally developed हिन्दुस्तान है

किसी के चाय की चुस्कियों की क़ीमत,
प्रदेश के चार टुकड़ों पर भारी पड़ती है,
हजारों रात कहीं कहीं..
सूखी रोटी के टुकड़ों पर कितनी ज़िंदगियाँ झपटती हैं

खैर, पेट भर चूका है,
दफ़्तर में बहुत आप धापी थी,
लौटते समय ठेके पर मैंने और तुमने,
बुद्धि जीवियों वाली बहुत बातें कर ली ...

When mind is without Fear
and choices are for free..
Then why this kolaveri kolaveri kolaveri di

Sunday, November 13, 2011

Some small trips...

विचारों और संवेदनाओं की मशाल,
पेट की भूख से अधिक ज्वलंत हो जाती हैं;
कभी कभी...
राष्ट्रीयता और धर्म की छाँव,
स्वार्थ की बेड़ियों से स्वतंत्र हो जाती हैं;
कभी कभी...

कुछ छोटी यात्रायें,
बड़ी दूरियां तय करने की मंत्र हो जाती हैं;
कभी कभी...

Friday, October 21, 2011

जब मैं नहीं बोलता, "मय" बोलता है

आलिम के दस्तूर से बेफ़िक्र,
जब मैं नहीं बोलता, "मय" बोलता है  
डरता हूँ, 
कहीं दबी हुई चिंगारी हंगामा न मचा दे.
महफ़िल को शादाब करने की ख्वाइशें
कहीं बस्ती न जला दें.

मेरी स्याही की पैमानों में,
कई रेशमी किस्से उलझे हैं;
मैं सारे अपने किस्सों को, बेज़बान झोले में रखता हूँ 
जब मैं नहीं बोलता, "मय" बोलता है  
डरता हूँ, 
कहीं किस्सों की समझ,
स्याही को बदनाम न करा दे 


Thursday, September 15, 2011

Engineer सब कुछ होता है

कभी In, कभी जिन्न....और कभी Engine होता है
कभी "Gunda", कभी "Troy".. कभी "Original Sin" होता है
Engineer सब कुछ होता है

रात का आवारा परिंदा, दिन भर सोता है
कभी बच्चा, कभी फच्चा...और कभी नाक में दम होता है,
Engineer सब कुछ होता है

कभी मुह पर ताला, कभी भक साला रहता है,
चार-पाँच साल में उसने सब कुछ कर डाला होता है
कभी इश्क में उसकी आँखें नम, कभी वो Atom Bomb होता है
कभी "पापा कहते हैं" कभी "g*d में"दम" होता hai
Engineer सब कुछ होता है

Thursday, September 08, 2011

चीख


कौन सी परिभाषा से करूँ संतुष्ट, स्वं की आधारशिला
मशीनी चाहतो में, चिंगारियों में, भय - भूख में लिपटी 
मेरी आत्मा आज कुंठित है!

ख़ुदा को खोजने के वास्ते हजारों ईंट नोचे हैं,
मंदिर हवन की शान्ति में कितने खून पोछें हैं'
कभी क्रांतियों में सर कटा कर लौट आतें हैं, 
कभी लाठियों से बेवजह ही चोट खातें है.  

किसी लालटेन की रौशनी में दुबकी हुई
हमारी हर लड़ाई, बस बयानों तक सिमित है
और अस्तित्व की कल्पना, शायद
अगले धमाके तक जीवित है!


Tuesday, September 06, 2011

Lines नहीं सीधे हैं

कांधे पर तेरे ओस के शायद बूंद पड़े थें
या जुल्फों से जैसे,
कुछ सपने मेरी आँखों में छलक गए थें;
सब टेढ़ा मेढ़ा दिखता था,
तुमने बोला Lines नहीं सीधे हैं.

खुली दीवारों में,
आसमान के रंगों सी परतें
मानो बचपन हौले हौले झूल रही थी
तुमने बोला Lines नहीं सीधे हैं.

कभी मैं हँसता, 
कभी तुम हँसती
दो आईने सोच सोच कर सबकुछ भूल रहे थें
Icecream के टुकड़ों में 'कच्छ' भूली बातें
पिघल पिघल कर lawn में टेढ़े गिरते थें;
तुमने बोला Lines नहीं सीधे हैं.

दो आवारा, बंजारों से,
चाय की प्याली घोल रहे थें
सब टेढ़ा मेढ़ा दिखता था,
तुमने बोला Lines नहीं सीधे हैं.

हम चुनेंगे कठिन रस्ते, हम लड़ेंगे

हम चुनेंगे कठिन रस्ते जो भरे हो कंकड़ों और पत्थरों से  चिलचिलाती धूप जिनपर नोचेगी देह को  नींव में जिसके नुकीले काँटे बिछे हो  हम लड़ेंगे युद्...