Wednesday, September 26, 2012

आस्मां तुम्हारा इंतज़ार कर रही है




मैंने जब चलना सीखा होगा
माँ की ऊँगली पकड़कर
धीरे धीरे,
तब मैं भी आकाश की तरफ ताकता हूँगा
आज़ाद पानी की तरह बहते हुए
पंछियों को देखकर
मैंने भी अपने आसमान का दायरा नापा होगा

मेरी कल्पना के गुब्बारे
घूमते होंगे - अलसाए
उन वाले भेड़ो की तरह पहाड़ों पर
कूदते होंगे - बेफ़िकर
गिलहरियों की तरह जंगलो में

बचपन पन्नों के ऊपर से धुलता गया
मैंने पेट की लालच में
ईंट से दोस्ती कर ली थी
अब ख़याल,
बासी चेहरों की तरह लटकते हुए पपड़ी बनकर
दीवारों पर उभर आते हैं
और उड़ान की बातें
चहारदीवारी के भीतर दम तोड़ देती है

बचपना बहुत कुछ सिखाता है 
आज़ाद बनो
पंछियों की उड़ान की तरह
आस्मां तुम्हारा इंतज़ार कर रही है


Tuesday, September 25, 2012

दीमक


मेरे अन्दर एक दीमक है
वक़्त-बेवक्त
ख्यालों में सीलन लगने पर जाग जाता है
और धीरे धीरे चबाने लगता है
ख्वाइशों का एक एक पन्ना

जब पेट की भूख
सूखे पत्तों की तरह खड़ खड़ाने कर जलने लगती है,
तब
उसे शांत करने के लिए
समाज से बाल्टी भर पानी उधर ले आता हूँ
पानी सूंघते ही ख्यालों के जबड़ों में सीलन लग जाती है
दीमक जाग उठता है

लगाव


कभी जब मेरे शब्द केचुए की तरह
    मिट्टी में दिशाहीन रेंगते मिलेंगे
तुम चुपके से आकर
उनमे जादू फूंक देना

मुझे रेगिस्तान से बहुत लगाव है

Sunday, September 23, 2012

चटनी


दिन भर सिलबट्टे पर घिसा होगा माँ ने
            धनिया, हरी मिर्च और लहसुन
नमक और सरसों डालने में लगा दी होगी
      अपने अनुभव की सारी mathematics
                   ममता की सारी economics
तब कहीं,
चटनी में 'वाह' वाला स्वाद आया होगा
'आह' वाला हरा रंग आया होगा

तुमने पराठे जल्दी निगलने के चक्कर में
बाज़ार से tomato ketch -up खरीद लिया था

अब पूछते हो कि
मज़हब के नाम पर
सुर्ख़ रंग का खून क्यूँ बिकता है बाज़ार में

Wednesday, September 19, 2012

Chapters


उँगलियाँ तैरती जाती हैं
पन्ने पलटते रहते हैं
कहीं सिलवटें, कहीं करवटें
कहीं काले गुलाबी धब्बे
तो कहीं
ख़ुद को ही मैं छोड़ आता हूँ

इतने सारे Chapters गुज़र गए हैं कि लगता है
अनपढ़ रहता तो ज्यादा ख़ुश रहता  


उस आख़िरी कश के साथ,
मैंने ख़ुद में फिर से ज़िन्दगी फूंक ली

Monday, September 17, 2012

नक्काशियां


कुछ बिलियन साल पहले
राख़ की आंधियां
आवारापन में मशरूफ़ अकेले घूमती होंगी
चाँद और सूरज के इर्द गिर्द.

पानी ने अपने स्पर्श से इसलिए शायद
पत्थरों पर
जिंदगी की नक्काशियां सोची होंगी

पत्थरों को खुरेद खुरेद कर
हमने घर बनाया
खंडहरों में ख़ुदा खोजा
ख़याल खोजा
खज़ाना खोजा  
जंगल और शहर बनाया

पठारों को तराशते तराशते
पानी तो विलीन हो गया
पर, हम ख़ुद पत्थर बन गए हैं

हम चुनेंगे कठिन रस्ते, हम लड़ेंगे

हम चुनेंगे कठिन रस्ते जो भरे हो कंकड़ों और पत्थरों से  चिलचिलाती धूप जिनपर नोचेगी देह को  नींव में जिसके नुकीले काँटे बिछे हो  हम लड़ेंगे युद्...