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Wednesday, September 08, 2010

हिस़ाब

सच तो ये भी है कि,
वक़्त की सारी साजिशें समझते हैं हम,
और,
खून की उबाल पर लगाम कसने वाले उसके ख़याल से,
अन्दर ही अन्दर जलते हैं हम.

सच तो ये भी है कि,
आईने और झुर्रियां - दोस्ती को बेताब हैं,
और,
रूह को कब्ज़े में रखने की तरक़ीब
उसने सीख ली है.

उठो, चलो !
सच की ऐसी कैफ़ियत को अनसुना करते हैं हम.
तोड़ते हैं आईने का श़क्ल, और,
पिंजरे के परिंदे को आज़ाद करते हैं.

आख़िर उम्र भी कभी ना कभी हिस़ाब मांगेगी

हम चुनेंगे कठिन रस्ते, हम लड़ेंगे

हम चुनेंगे कठिन रस्ते जो भरे हो कंकड़ों और पत्थरों से  चिलचिलाती धूप जिनपर नोचेगी देह को  नींव में जिसके नुकीले काँटे बिछे हो  हम लड़ेंगे युद्...