मैं बस एक राज़ हूँ,
एक दिन गुमनाम दफ़्न हो जाऊंगा,
तेरे कूचे में भटकता हुआ,
कोई बदनाम ज़ख्म हो जाऊंगा।
मेरे प्याले से तेरे रूह की प्यास ना बुझी,
अब मैखाने में मनाया हुआ रस्म हो जाऊंगा।
वक़्त भी मसलने की कोशिश क्यूँ करेगा,
दीवारों में दरार बन ख़त्म हो जाऊंगा,
ख्यालों में उलझी हुई, नज़्म तुम समझो,
या चादर में लिपटा पागल कोई पतझड़,
किसी महफ़िल में उड़ाया हुआ,
एक जशन हो जाऊंगा।
मैं बस एक राज़ हूँ,
एक दिन गुमनाम दफ़्न हो जाऊंगा।
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4 comments:
bahut achhi hai Raj ...
poetic freedom ka jyada use hai ...:)
good one pandu...i will surely record that great going jumbo...sooner than later u r going to carve a niche for yourself in the film industry...(ofcourse for sad songs).
ye kavi raj ke dil se nikli hui aawaaj lag rahi hai....
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