Monday, April 06, 2009

मैं बस एक राज़ हूँ,

मैं बस एक राज़ हूँ,
एक दिन गुमनाम दफ़्न हो जाऊंगा,
तेरे कूचे में भटकता हुआ,
कोई बदनाम ज़ख्म हो जाऊंगा।

मेरे प्याले से तेरे रूह की प्यास ना बुझी,
अब मैखाने में मनाया हुआ रस्म हो जाऊंगा
वक़्त भी मसलने की कोशिश क्यूँ करेगा,
दीवारों में दरार बन ख़त्म हो जाऊंगा,

ख्यालों में उलझी हुई, नज़्म तुम समझो,
या चादर में लिपटा पागल कोई पतझड़,
किसी महफ़िल में उड़ाया हुआ,
एक जशन हो जाऊंगा।

मैं
बस एक राज़ हूँ,
एक दिन गुमनाम दफ़्न हो जाऊंगा

4 comments:

alok singh said...

bahut achhi hai Raj ...

alok singh said...

poetic freedom ka jyada use hai ...:)

amaresh's oeuvre said...

good one pandu...i will surely record that great going jumbo...sooner than later u r going to carve a niche for yourself in the film industry...(ofcourse for sad songs).

sajjan said...

ye kavi raj ke dil se nikli hui aawaaj lag rahi hai....

तुम्हारे दीदार से मुक़म्मल होती थी वो कवितायेँ  जो आज कल अधूरी-अधूरी ही ख़त्म हो जाती हैं.