Sunday, August 13, 2017

ये "हम लोग" वाले लोग जब inert या blind हो जाते हैं तो स्थिति बहुत डरावनी हो जाती है|

एक और 15 अगस्त आने वाला है| बहुत कुछ वैसा ही होगा, जैसा हर साल होता है| Facebook और twitter पर profile picture बदल दिए जाएंगे; whatsapp पर तिरंगे वाले GIF के साथ बहुत सारे देशभक्ति वाले forwards आएंगे; TV के किसी कोने में प्रलय नाथ गेंडास्वामी और ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह लड़ते दिखेंगे; स्कूलों और दफ़्तरों में जोश से भरे भाषण दिए जाएंगे; गांधी, नेहरू, पटेल, भगत, आज़ाद को याद किया जाएगा; बॉर्डर पर खड़े सैनिकों के लिए emotions से भरे विचार लिखे जाएंगे और अंततः देश की बदहाली के लिए नेताओं, बाबुओं और सरकारी कर्मचारियों को कोसा जाएगा| इन्हे हर साल कोसा जाता है, और क्यों ना कोसा जाए -- अपने लालच को पूरा करने के लिए इन्होने आम जनता को इतना निचोड़ दिया है कि अब dry cleaning भी हमारी सिलवटों को हटा नहीं पाते| 

वैसे तो भ्रष्टाचार और बदहाली के लिए नेताओं, बाबुओं और सरकारी कर्मचारियों को कोसना हमारा staple diet बन चूका है, लेकिन एक culprit है, जो हमेशा बच जाता है -- जो अपने फ़ायदे के लिए इन बाबुओं को पैसा खिलाता है, लेकिन बाद में corruption का राग रोता है; जो सड़कों पर चलते समय केले का छिलका फेक आता है, लेकिन गन्दगी पर municpial corporation से उसकी ज़िम्मेदारी पूछता है; जो घूस मांगने के लिए किसी भी हद्द तक गिर जाता है, लेकिन पैसों की कमी से पढाई ना कर पाने वाले बच्चों पर दुःख जताता है; जो ट्रैफिक में पांच मिनट फंस जाने पर हॉर्न देकर लोगों का कान फाड़ देता है, लेकिन उसे देश में अनुशाषन की कमी दिखती है|  

जी, आप बिलकुल सही पकड़े हैं| ये Constitution के preamble में लिखे गए "We the people of India" वाले वही लोग हैं, जो दशकों से बस दूसरों पर ऊँगली उठाते आये हैं, लेकिन अपने रिश्तेदारों की ऊपरी कमाई को बहुत शान से बताते हैं|  ये संविधान के प्रस्तावना में बताये गए "हम, भारत के लोग" वाले वही लोग हैं, जिन्हे दहेज लेने वालों पर गुस्सा आता है, लेकिन जैसे ही उनका बेटा IAS बनता है, दहेज की बोली पचास लाख पहुंच जाती है| ये "हम लोग" हैं|

पिछले सत्तर सालों में हम लोगों ने सड़क और पुल कम बनाये हैं, लेकिन वाद और ism बहुत ज्यादा बना दिया है -- गाँधीवाद, समाजवाद, लोहियावाद, जातिवाद, Right Wing, Left Wing, Center Right, Center Left, Nehruvian, Savarkarian...और मुश्किल ये है कि इतना सारा हमसे हज़म भी नहीं हो पाता इसलिए हम अलबला जाते हैं| जब भी कोई tragedy हो जाए, सबसे पहले हम ये देखते हैं कि ये किस "ism" में फिट होता है, उसके बाद ये खोजते हैं कि इस "ism" का जिम्मा किसपर थोपा जाए ताकि मेरा वाला "ism" बच जाए| इस "ism" वाली लड़ाई में tragedy जीत जाती है और हम हार जाते हैं, लेकिन हम इतने अभागे हैं कि उसे भी हम आँख बंद कर अपना जीत मान लेते हैं| ये "हम लोग" वाले लोग युद्ध में लड़ने वाले वो प्यादे हैं जिन्हे विजय के गंतव्य और युद्ध की दिशा से कोई मतलब नहीं| इन्हे बस इससे मतलब है कि आप किस side खड़े हैं|   

तीन दिन पहले रांची में एक wrestler की करंट लगने से मौत हो गयी| स्टेडियम की हालत इतनी जर्जर थी कि फोटो से भी आंसू टपक रहे हैं| ख़बर जब फैली तो देश ख़ेमे में बंट गया:

1. एक वर्ग चाहता था कि दोषियों को लटका दिया जाए| ये ऐसा वर्ग है जो हमेशा दोषियों को लटका देना चाहता है, लेकिन जब इनके घरों में बैठे रिश्तेदार सड़कों में सीमेंट की जगह रेत डालकर पैसा बनाते हैं, सरकारी हॉस्पिटल या सरकारी कॉलेज में छुट्टी मार कर प्राइवेट इंस्टिट्यूट चलाते हैं, दफ़्तरों में घूस लेकर घर लौटते हैं तो ये चुप रह जाते हैं| 

2. दूसरे वर्ग ने घटना का पोस्ट-मार्टम राजनीति के औजारों से कर दिया| अपने सुविधा और स्वादानुसार नेहरू को, मोदी को, RSS को, दलितों को, हिन्दुओं को, मुसलमानों को दोषी और पीड़ित बनाकर लाश पर कफ़न पहना दिया  

3. तीसरा वर्ग inert हो चूका है| इतने लोग तो मरते ही हैं, एक और मौत हो गयी तो हो गयी| जब सरकार और सिस्टम बदलने से भी कुछ नहीं होता, तो बहुत सारे लोग inert होने लगते हैं| 

स्टेडियम का क्या हुआ किसी को नहीं मालूम| कितने खिलाड़ियों का मनोबल टूटा इससे कोई मतलब नहीं| हाँ, लेकिन हमने इसका जिम्मा किसी के सर थोप दिया| 

गोरखपुर में बच्चों की मौत पर भी ऐसा ही कुछ हुआ| कश्मीर में भी ऐसा हो रहा है|  

बारिश में सड़के पिघल जाती हैं और लोग गड्ढ़ों में डूब कर मर जाते हैं लेकिन हम अपनी political party पर ऊँगली उठाने वालों को ट्रोल कर के सारा दर्द मिटा लेते हैं ; जब व्यापम में, बिहार में, केरल में और बंगाल में whistle blowers रातो रात गायब हो जाते हैं, हम अपने "ism" को सही ठहराने के लिए आँखें बंद कर लेते हैं;  कोई anti-national को खोज लेता है, कोई संघी मोदी भक्त को, तो कोई आपटर्ड को| कुछ नहीं मिलता है तो हम राहुल गाँधी पर ही चुटकुला बना लेते हैं| समस्या वही की वही रह जाती है| 

ये "हम लोग" वाले लोग जब inert या blind हो जाते हैं तो स्थिति बहुत डरावनी हो जाती है| हम अभी उसी स्थिति से गुज़र रहे हैं| 

कुछ लोग कहते हैं "थाली का बैगन मत बनो, साइड लो"| "साइड लो"? किसका? किसके लिए? भाई polygon हो क्या जो साइड लेकर ज़िन्दगी गुज़ार दोगे? रात को नींद कैसे आ जाती है?

खैर, पंद्रह अगस्त आ रहा है| whatapp forward कीजिये, दिल खोलकर दूसरों को कोसिये और जानी दोपहर में किसी चैनल पर तिरंगा तो आएगा ही| 

1 comment:

Amrita Tanmay said...

कटु सत्य ।

तुम्हारे दीदार से मुक़म्मल होती थी वो कवितायेँ  जो आज कल अधूरी-अधूरी ही ख़त्म हो जाती हैं.