Monday, July 02, 2012

इंसान बनते हैं;


बह चूकी नदियाँ शराबी
धूल गयीं बातें किताबी
अब छोड़ कर, बातें गुलाबी
इंसान बनते हैं;
खण्डहर सा रात भर बैठा रहा परिवार मेरा;
अब शमशान वाली जिद्द हटाकर
मकान बनते हैं.
दरिंदो जैसे चीखकर, नोचकर
क्या मिला है - मुझको, तुमको?
नशे वाली रात काली,
इस रात से अब अनजान बनते हैं
अपने लिए, अपना ही
सम्मान बनते हैं

अब छोड़ कर, बातें गुलाबी
इंसान बनते हैं;

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तुम्हारे दीदार से मुक़म्मल होती थी वो कवितायेँ  जो आज कल अधूरी-अधूरी ही ख़त्म हो जाती हैं.