Wednesday, June 27, 2012

shawl

रास्ते खो जायें कहीं ना,
धुएँ की ख़ामोशी में...
शाम कब मूह फेर लेगा 
अनकही मदहोशी में

मौला तूने महताब देकर 
रात के आँचल की बदनामी बचा ली
मौला तूने हालह के नूर से
अब्र की अनकही गुमनामी छिपा ली

यार मौला,
मैं भी ख़ुद की शोर में, कहीं खो गया हूँ
इस अमावस मेरे सर पर भी
'shawl' रख देना

ये पुलिया थोड़ी लम्बी है   
  

1 comment:

poonam said...

behtreen

तुम्हारे दीदार से मुक़म्मल होती थी वो कवितायेँ  जो आज कल अधूरी-अधूरी ही ख़त्म हो जाती हैं.