Sunday, February 13, 2011

इश्क़

सुबह छिटक कर,
बिस्तर में आ जाता है
सूरज का कुछ टुकड़ा;
अंगराईयां मेरी- मुट्ठी में उन्हें भर लेती हैं.

'बालकनी' में 
जब भी मिलते हैं आपस में - एक प्याली चाय की चुस्की
और, मिट्टी की सौंधी सी खुशबू;
मैं पंख लगाकर, 
हौले हौले नन्हे पत्तों सा बह लेता हूँ.

थोड़ा थोड़ा चाँद चुराकर,
लिफाफों को रंगते आये हैं - 'तुम और मैं'

लेकिन,
पतझड़ की किसी सांझ को जब,
लालटेन नहीं जलता है, और 
चाहतों की चीख़ नाकाम होती है
हम, राख़ के जैसे बिख़र जाते हैं.
सुलगती जाती है बेचारी ज़िंदगी,
और,
किसी बेनाम चौराहे पर बदनाम होती है.

चलो, 
ओढ़कर इसकी ख़ुशबू, ज़िंदगी से थोड़ा इश्क़ करते हैं,
ज़िंदगी के नाम पर मरने से पहले, ज़िंदगी जी लेते है.

इतने संस्कार का अचार डालोगे क्या?

आप एक दिन अपनी गाडी लेकर सड़क पर जा रहे हैं; कुछ लोग आकर आपको ताना मारते हैं, कुछ गाली देते हैं और कुछ लोग आपके कार को तोड़ फोड़ देते हैं, बाद...