Saturday, August 21, 2010

शहर

कुछ शौक को दफ़न करके, नया शौक पाल लेते हैं. 
कुछ ज़ख्म को छिपाकर, नया ज़ख्म डाल लेते हैं.
इस शहर का सुनसान कँही अपनी गुफ़्तगू सुन न लें,
चलो संदूक से नयी शक्ल, नयी पोशाक निकाल लेते हैं. 


हर शख्स का चेहरा मिलता है हुबहू,
हर ख्वाइशों की चादर का रकबा भी एक है,    रकबा - Area
कुछ सरफिरों ने चंद आसमानी तस्वीरें खींच ली,
इस शहर में आइना नहीं बिकता, 
बाज़ार में खीचें गए तस्वीरें बिकते हैं. 


आँखों में बेबसी की झलक, 
माथे पर दरारें क्यूँ हैं,
इस नस्ल में आख़िर 
सभी थके-हारे से क्यूँ हैं,  
ये रंगीन शहर कभी बुझता ही नहीं है. 
हर लाश के दरमयां, ये दीवारें क्यूँ हैं. 

इतने संस्कार का अचार डालोगे क्या?

आप एक दिन अपनी गाडी लेकर सड़क पर जा रहे हैं; कुछ लोग आकर आपको ताना मारते हैं, कुछ गाली देते हैं और कुछ लोग आपके कार को तोड़ फोड़ देते हैं, बाद...