Saturday, April 25, 2009

क्यूं चौक सा गया था मैं














सांझ
को किसी मोड़ से,
सौंधी सी खुशबू आने लगी,
जिंदगी वहाँ थम गई,
घबराने लगी.. चुप हुई...मुस्कुराकर शरमाने लगी।

क्या पता,
उस शाम ढलती मोड़ पर
क्यूं चौक सा गया था मैं,
क्यूँ पता,
उस ओस से टकराकर,
खामोश सा हो गया था मैं...

लडखडाती राहें पगली,
मोड़ पर थम जाती हैं,
अनकहे इंतज़ार की ख्वाइश में गुम जाती हैं।

बिंदास था, कुछ लम्हों के अल्फास में,
मैं खो गया।
उस सुस्त चलती मोड़ पर,
धीमे आहट से कुछ हो गया...

क्या पता,
उस शाम ढलती मोड़ पर
क्यूँ चौक सा गया था मैं,
क्यूँ पता,
उस ओस से टकराकर,
खामोश सा हो गया था मैं...

Monday, April 06, 2009

मैं बस एक राज़ हूँ,

मैं बस एक राज़ हूँ,
एक दिन गुमनाम दफ़्न हो जाऊंगा,
तेरे कूचे में भटकता हुआ,
कोई बदनाम ज़ख्म हो जाऊंगा।

मेरे प्याले से तेरे रूह की प्यास ना बुझी,
अब मैखाने में मनाया हुआ रस्म हो जाऊंगा
वक़्त भी मसलने की कोशिश क्यूँ करेगा,
दीवारों में दरार बन ख़त्म हो जाऊंगा,

ख्यालों में उलझी हुई, नज़्म तुम समझो,
या चादर में लिपटा पागल कोई पतझड़,
किसी महफ़िल में उड़ाया हुआ,
एक जशन हो जाऊंगा।

मैं
बस एक राज़ हूँ,
एक दिन गुमनाम दफ़्न हो जाऊंगा

तुम्हारे दीदार से मुक़म्मल होती थी वो कवितायेँ  जो आज कल अधूरी-अधूरी ही ख़त्म हो जाती हैं.