Friday, August 31, 2012


मुहल्ले में तेरे नखरों के चर्चे हैं,
तेरी जुल्फों का फ़िर से हंगामा है;

हवस तू ये बता,कब दिल्ली छोड़ेगी?

फिर तेरी आवारगी, चराग़ सी इतराने लगी है
बंद रौशंदानियों से, रौशनी फिर आने लगी है

ख़ामोश ठहरा खँडहर, सदियों से यूँ बेज़ार था
ज़िन्दगी तेरी लुकाछिपी, फिर गुदगुदाने लगी है

इश्क़ मुहब्बत वाला लौंडा जब झंडा लेकर घूमने लगा

2012 के मई की चिलचिलाती गर्मी चीटियों की तरह शरीर पर चुभ रही थी| ज़मीन एक एक क़तरा पानी के लिए ललचाये निग़ाहों से आसमान की तरफ़ ताक रहा था, लेक...