Friday, October 01, 2010

We -The People

उम्र की चादर
जब मेरे घुटने तक हीं आ पाती थी,
और आलिम, फ़ाज़िल, बुद्धिजीवियों की तालिमें
बस्ते में रह जाती थीं,


मैं तेज़ भाग कर चाँद चूमना चाहता था.


अब,
मेरी जिदद जब चाँद से हटकर,
रोटी पर थम आती है;
और अँगीठी पर हाथ सेक कर,
नींद मुझे आ जाती है;


तुम क्यूँ मेरी रोटी को नोंचने,
मेरे गलिआरे आ जाते हो?
कभी मज़हब, कभी जाति बताकर,
मुझको ठगते जाते हो.


वैसे भी,
हर नीलामी में,
मैं अपना वज़ूद बेचने जाता हूँ,
कुछ किस्से अपने कहता, कुछ औरों से सुन आता हूँ.


नीलामी के सिक्के रख लो
रोटी मुझको खाने दो,


आज बहुत मैं भूखा हूँ.

इतने संस्कार का अचार डालोगे क्या?

आप एक दिन अपनी गाडी लेकर सड़क पर जा रहे हैं; कुछ लोग आकर आपको ताना मारते हैं, कुछ गाली देते हैं और कुछ लोग आपके कार को तोड़ फोड़ देते हैं, बाद...