Sunday, June 13, 2010

मोसे और लिखा नहीं जाए*

बदरा मोरे अंगना पिघल गएँ,
बैरी बड़े इतरायें,
अंखियों ने जो गीत लिखा है,
मोहे सारी रात चिढाये;
मोसे और लिखा नहीं जाए..

दर्द ये मीठा, थमता नहीं है,
सावन भी रह रह इतराए
हर आहट हम करवट बदलें,
मोहे सजनी की याद सताए
मोसे और लिखा नहीं जाए

याद में तोरी रात गुजर गयी,
बदरा पिघल छिप जाए
नयनो में तोहे भर लेंगे,
तोरे नयनो से अब ना लजाएँ
मोसे और लिखा नहीं जाए...

*Inspired by मोरे सैयां मोसे बोलत नाही

तुम्हारे दीदार से मुक़म्मल होती थी वो कवितायेँ  जो आज कल अधूरी-अधूरी ही ख़त्म हो जाती हैं.