Thursday, November 04, 2010

"हैपी बर्थडे"

यादों की टहनियों पर
कुछ बूंदें जो बचपन से मैंने छोड़े थें
मंझे धागों में लिपटे हुए पतंग,
जिन्हें आसमान को ताक-ताक के बटोरे थें
बारिश में भीगे कुछ पत्तें,
जिनपर छिप छिपकर मैंने कुछ नाम लिखा था
काली राख का हुक्का,
जिनके चाहत में, मैं कुछ शाम बिका था,
छुक छुक करती लम्हों की वह "ट्रेन",
जहाँ कुछ लोग मिले थें.
धूल में लिपटे रस्ते, जो मेरे संग कुछ देर चले थें

मेरे साथ पड़े थें
और 
मैं था, मिटटी का मेरा ये देह
"हैपी बर्थडे"

4 comments:

डिम्पल मल्होत्रा said...

"हैपी बर्थडे" :)

crazy devil said...

@ Dimple - Thanks

Ravi Rajbhar said...

very nice

MAYA said...

सुन्दर कविता, .............ब्लोग अच्छा लगा..

ये "हम लोग" वाले लोग जब inert या blind हो जाते हैं तो स्थिति बहुत डरावनी हो जाती है|

एक और 15 अगस्त आने वाला है| बहुत कुछ वैसा ही होगा, जैसा हर साल होता है| Facebook और twitter पर profile picture बदल दिए जाएंगे; whatsapp पर ...