Monday, December 24, 2007

छोड़ दो मुझे, कभी तो सांस लेने दो

शाम है ढल गयी, चुपचाप सोने दो,
घुट रहा हूँ मैं, कुछ शब्द कहने को,
छोड़ दो मुझे, कभी तो सांस लेने दो....

चप्पे चप्पे पर तुम्हारी जाल लिपटी है,
आसमा से ज़मीन तक, हर सोच चिपटी है
कोनों में , दीवारों में बस झाक लेने दो,
छोड़ दो मुझे, कभी तो सांस लेने दो...

शाम है ढल गयी, चुपचाप सोने दो,
सूख गयीं आँखे, कभी तनहा रोने को,
घुट रहा हूँ मैं,
अब सांस लेने को,
छोड़ दो मुझे, कभी तो सांस लेने दो
छोड़ दो मुझे, कभी तो सांस लेने दो

1 comment:

VaRtIkA said...

"चप्पे चप्पे पर तुम्हारी जाल लिपटी है,
आसमा से ज़मीन तक, हर सोच चिपटी है
कोनों में , दीवारों में बस झाक लेने दो,"

बहुत खूब..........

Ugly

लोहा, लक्कड़, ताला, चक्कर घिच-पिच कर के बैठा है बाहर से चमचम करता है दिल अंदर से ugly है मौसम, पानी, सात समंदर गलियों गलियों घूमा है...