Tuesday, September 11, 2012


तेरे चेहरे की दरारों में लिक्खा है ये चाँद
कि तुने दिल अपना बहुतों में बांटा होगा

कमाल है


तुम्हारा DNA basis अलग होगा,
और मेरा शायद अलग
तुम्हारी चमड़ी गंगा से धुली होगी
हमारी जन्मजात नाले में घुली होगी
तुम फूल बनकर जन्मे थे,
मैं दलदलों में कहीं सड़ता होऊंगा

मेरी परछाईं भी,
तुम्हारे पुरखों का धर्म भंग करती है
मृत आत्माओं की तरह,
तुम्हे सुबह शाम तंग करती हैं

तुम्हारा भगवान्,
मंदिर के अन्दर बैठता है
और मेरा भगवान्,
सीढियों पर बैठ कर, सालों से
अन्दर जाने का इंतज़ार कर रहा है

कमाल है भाई साहब,
आप कुत्तों को भी पालते हैं, पुचकारते हैं
चाटते हैं
आदमी छूने में आपकी फट लेती है

चार-पांच लड़के


चार-पांच लड़के,
हाथो में कुल्हड़ वाली चाय लिए
बैठते थें, नदी किनारे;
कभी कभी देर तक बातें होती,
कभी देर तक ख़ामोशी सोती

चार-पांच लड़के देर तक
ताकते रहतें
पंछियों को, पत्थरों को
नदी को, जल स्तरों को
कभी कभी अचानक सभी हंस देते
कभी लौट जाते अहिस्ता, अकेले अकेले

चार-पांच दोस्त
college से graduate हो गयें;
आज भी लेकिन, खोज रहे हैं,
नदियाँ, पंछियाँ, पत्थर, और मुस्कराहट
और बचे अपने तीन चार दोस्तों को

तुम्हारे दीदार से मुक़म्मल होती थी वो कवितायेँ  जो आज कल अधूरी-अधूरी ही ख़त्म हो जाती हैं.