Tuesday, September 11, 2012

चार-पांच लड़के


चार-पांच लड़के,
हाथो में कुल्हड़ वाली चाय लिए
बैठते थें, नदी किनारे;
कभी कभी देर तक बातें होती,
कभी देर तक ख़ामोशी सोती

चार-पांच लड़के देर तक
ताकते रहतें
पंछियों को, पत्थरों को
नदी को, जल स्तरों को
कभी कभी अचानक सभी हंस देते
कभी लौट जाते अहिस्ता, अकेले अकेले

चार-पांच दोस्त
college से graduate हो गयें;
आज भी लेकिन, खोज रहे हैं,
नदियाँ, पंछियाँ, पत्थर, और मुस्कराहट
और बचे अपने तीन चार दोस्तों को

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Ugly

लोहा, लक्कड़, ताला, चक्कर घिच-पिच कर के बैठा है बाहर से चमचम करता है दिल अंदर से ugly है मौसम, पानी, सात समंदर गलियों गलियों घूमा है...