Thursday, April 13, 2017

इतने संस्कार का अचार डालोगे क्या?

आप एक दिन अपनी गाडी लेकर सड़क पर जा रहे हैं; कुछ लोग आकर आपको ताना मारते हैं, कुछ गाली देते हैं और कुछ लोग आपके कार को तोड़ फोड़ देते हैं, बाद में सारा दोष भी आप पर ही थोप दिया जाता है; ये सबकुछ बस इसलिए क्यूंकि उन्हें लगता है कि आपकी गाडी का रंग अच्छा नहीं है| संस्कार के नाम पर अक्सर ऐसा ही बहुत कुछ थोप दिया जाता है| 

एक लड़की जब छोटे कपड़ों में घर से बाहर निकलती है, और सड़क पर चलते हुए लुच्चे लफंगे उसपर कुछ भद्दी टिपण्णी कर दें या कॉलोनी में सूखे पेड़ की तरह खड़खड़ाते बुड्ढे उसको देख कर "हमारे समय में...." वाली उटपटांग बातें शुरू कर दें या दिन रात गॉसिप करने वाली आंटियां नाक-भौं सिकोड़कर उसपर ताना कस दें, तब जानते हैं सबसे ज्यादा गलती किसकी होती है? उस लड़की की, और सबसे ज्यादा नुक्सान किसे होता है? - हमारे संस्कार को| हमारा संस्कार इतना नाज़ुक है कि हर छोटी बात पर बुरा मान जाता है| 

आख़िर ये संस्कार साला आता कहाँ से है? इन्हे बनाता कौन है? इसमें सही ग़लत का पैमाना कौन डालता है? समझना है तो कुछ सामान्य से प्रश्न लोगों से पूछ लीजिये और उत्तर आपको मिल जायेगा| उदाहरण के तौर पर -- लड़कियों का छोटा कपडा पहनना गलत क्यों है?

उत्तर ऐसा मिलेगा:
1. लड़की काम कपडा में घूमेगी और लड़का सब सीटी मारेगा तो अच्छा लगेगा?
2. समाज में रहना है तो कुछ नियम मानना पड़ेगा इसलिए मान लो| 
3. लड़कियां हमारे घर की इज़्ज़त है, उनका ये ग़लत है| 
4. तुम्हारी माँ और बहन जब छोटे कपड़ों में घूमेगी तब पता चलेगा|
5. बच्चों पर इसका क्या असर पड़ेगा|  

मतलब चूकि आप अपने मोहल्ले के आवारा लड़कों और ठरकी बुङ्ढों को संभाल नहीं पाते या आपका "संस्कारी समाज" अपने समाज के मनचलों को संभाल नहीं पाता है इसलिए आप सारा बंधन लड़की पर चिपका दीजिये, उसके पंख काट दीजिये और सीना तान के कहिये कि आप बहुत संस्कारी हैं|  ख़ैर, कई लोगों को तो ये पता भी नहीं होता कि ये संस्कार वाले चोचले सही हैं या गलत| पूछने पर बोलेंगे, "सदियों से ऐसा चला आ रहा है, मेरे आस-पड़ोस वाले भी यही कहते हैं, मेरे फूफा और मौसा भी इसे सही कहते हैं| समाज में रहना है तो मानना पड़ेगा| इसलिए सही है|" 

कुछ लोग कहेंगे कि लड़कियां घर की इज़्ज़त हैं| मतलब लड़के इज़्ज़त नहीं है, इसलिए कच्छा-बनियान पहनकर गली में घूम सकते हैं? और क्या लड़की को घर की इज़्ज़त बनाने से पहले आपने पूछा भी था कि वो इज़्ज़त बनना चाहती हैं या नहीं| किसी को इज़्ज़त बनाकर उसकी सारी ज़िन्दगी पर अपने उम्मीदों का पहाड़ तोड़ना कैसे सही है?

एक कैटेगरी वो वाला होता है जिसे कुछ भी बोलो वो सीधे माँ और बहन पर आ जाता है| जैसे माँ और बहन घर में रखा हुआ कोई object है जिसे जिधर मन किया उधर घुमा लो| मेरी माँ या बहन को जो पहनना है, जो खाना है, जो पीना है ये उनके choice पर होना चाहिए| वो किसी के ग़ुलाम तो नहीं कि उनको क्या पहनना है और क्या नहीं ये कोई और बताये|  

बच्चों पर क्या असर पड़ेगा इसका तो भगवान् मालिक है| ये वही बच्चे हैं जिन्हे शादी के एक दिन पहले तक आप सेक्स की बातें करने पर असंस्कारी मान लेते हैं, और शादी के दिन केसर में दूध डालकर पिलाते हैं और बोलते हैं कि आज ही एक नन्हा सा लल्ला दे दो| 

ऐसा ही फ़्रेमवर्क हर morality वाले argument में घुसेड़ दिया जाता है| लड़की होकर छोटा कपडा पहनो तो संस्कार ख़राब, लड़की होकर ज़ोर से हंसों तो संकर ख़राब, शराब पियो तो संस्कार ख़राब, सिगरेट पियो तो संस्कार ख़राब, शादी के पहले इश्क़ करो तो संस्कार ख़राब, सेक्स करो तो संस्कार ख़राब, सेक्स की बातें करो तो संस्कार ख़राब और कभी कभी तो लड़का होकर लड़की से दोस्ती कर लो तब भी संस्कार ख़राब हो जाता है|

भारतीय जनता पार्टी के उत्तर प्रदेश विजय के बाद अचानक से लोगों का संस्कार उमर कर दिखने लगा है| वैसे तो असंस्कार बहुत सारे लोगों को पहले भी बुरा लगता था लेकिन अब वैसे लोग भी सफ़ाई देने लगे हैं जो पहले ऐसे प्रतिबन्ध को पहले गलत कहते थे| लड़का-लड़की साथ में घूमे तो संस्कार ख़राब हो रहा है, शराब पी ले तो ख़राब हो रहा है|  जो लोग ना सरकार के हैं और ना पुलिस या क़ानून के वो सड़क पर घुमते प्रेमी प्रेमिकाओं का संस्कार ठीक कर रहे हैं| शराब बंदी पर बहस करने पर लोगों का जवाब आ रहा है कि "शराब नहीं पीओगे तो मर तो नहीं जाओगे?"  

ख़ैर सेक्स की आज़ादी पर सोचना तो मूर्खता ही है| गुड़गांव के पॉश कॉलोनियों में लड़का अपने घर में महिला मित्र नहीं बुला सकता| ये इक्कीसवी सदी है और आश्चर्य ये है कि लोगों को इसमें आश्चर्य नहीं होता| उनका संस्कार उफ़न -उफ़न कर बाहर आ जाता है और वो किसी के freedom को कुचलना समाज के संस्कार की उन्नति समझते हैं| 

क्या समाज में संस्कार का मतलब individuality का गला घोंटकर सब को एक नियम पर ढालना होता है? इंसान बगीचा में लगा घास तो नहीं है ना कि कैंची लिया और सब को काट-छांट के एक जैसा बना दिया| सबकी अपनी ज़िन्दगी है, वो भी मात्रा सत्तर-अस्सी साल की|  उसको जीने के लिए भी दूसरों का नियम-क़ायदा मान लो, बस इसलिए क्यूंकि दूसरों को अच्छा लगेगा? इतने संस्कार का अचार डालोगे क्या?

Saturday, April 08, 2017

Jaichand , turncoat, opportunist -- इनमें से आप कौन हैं?

आज से दस पंद्रह साल पहले मुझे राजनीति में बस इतनी दिलचस्पी थी कि मैं quiz competitions के लिए राजनेता और राजनैतिक दलों का नाम याद कर लेता था| शायद उस समय राजनैतिक विचारधारा का ना होना उतना अबोध नहीं माना जाता था, जितना आज के समय में माना जाता है| आज यदि आप राजनैतिक चर्चाओं में सक्रिय किसी व्यक्ति को बोल दें कि आपको राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं, तो आपको बेचारा और ignorant समझ लिया जाएगा| इससे भी मज़ेदार बात ये है कि यदि आपने किसी व्यक्ति के राजनैतिक दृष्टिकोण के विरूद्ध कुछ बोल दिया तो आपकी पूरी कुंडली खोल दी जायेगी| आपने क्या खाया, क्या देखा, क्या सुना, आप किस बात पर हँसे, किस बात पर मुस्कुराएं और किस बात पर रोयें सब का पूरा analysis मिल जाएगा|     

मैं यहाँ कोई moral high ground नहीं लेना चाहता| मैंने भी ख़ूब analysis किया है, मैंने भी कई कुंडलियां खोली हैं; मेरा भी ख़ूब analysis हुआ है, मेरी भी कई कुंडलियां खुली हैं| राजनीति के बाज़ार में कभी आप शिकारी होते हैं, तो कभी शिकार| ये खेल चलता रहता है| हालाँकि ये समझना ज़रूरी है कि इस पूरे उठा-पटक में आपने क्या पाया और क्या गंवाया| 

चार पांच साल तक लिखने, पढ़ने, बात करने और हल्ला मचाने के बाद दो चीज़ें जो मुझे समझ आयी हैं वो ये है कि (a) हर किस्म की व्यक्तिगत आज़ादी बहुत महत्त्वपूर्ण है (b) किसी भी इंसान को समझने के लिए उसके जीवनकाल को समझना चाहिए, किसी एक point पर उसके विचारों का छीछालेदर करके उसपर निर्णय देना गलत होता है| अगर 16 अक्टूबर 1935 के दोपहर चार बजे चाय पीते हुए यदि गांधी ने बोल दिया कि "देसी चाय में fun नहीं आया", तो उनके उस स्टेटमेंट को बार बार दिखा कर उन्हें libtard बताना सही नहीं होगा| इससे पहले कि आप मेरा स्क्रीनशॉट दिखाएं मैं फिर से बता देता हूँ कि ये स्क्रीनशॉट वाली कई analysis मैंने भी की है, और वो उचित नहीं है| 

Rhetoric उछालने वाले टाइम में कमरे में आराम से बैठ कर ज्ञान देना आसान होता है| आपके पास भर भर के लाइक्स आ जाते हैं, आपके खेमे में वाह वाही का ताता लग जाता है, फिर आपके विरोधी खेमे के लोग बैठ कर आपकी गलती निकालते हैं, और ये चलते जाता है| समस्या वही की वही पड़ी रह जाती है, उसका समाधान नहीं होता| 

जब एक बच्चा पहली बार "यदि मैं प्रधानमंत्री होता" पर निबंध लिखता है, तो ये लिखता है कि मैं देश से दुःख और दर्द ख़त्म कर देता, जुर्म और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कदम उठाता, स्कूल और कॉलेज बनवाता, हॉस्पिटल और स्टेडियम खुलवाता...हालाँकि बचपन में लिखे गए "यदि मैं प्रधानमंत्री होता" वाले निबंध में अव्यभारिकता और अपरिपक्वता दिख जाती है, लेकिन साथ ही साथ उसमें सरलता और ईमानदारी भी होती है|

स्क्रीनशॉट वाले टाइम में अपने आप से ईमानदार होकर लिखना थोड़ा मुश्किल हो गया है| दुःख, दर्द, भ्रष्टाचार या जुर्म पर लिखने से पहले ये देखना ज़रूरी हो गया है कि आपका लिखा हुआ आपके ग्रुप को ठेस ना पहुंचा दे| ऐसा किया तो चार साल पहले आपने कुछ लिखा था और आज कुछ और लिख रहे हैं वाले "before" और "after" स्क्रीनशॉट दनादन छपने लगेंगे| 

मुद्दों पर निजी राय देने से पहले ये देखना ज़रूरी है कि आप जिस पार्टी को अक्सर समर्थन देते हैं उसने क्या कहा है|  

एक गरीब रिक्शावाला ATM के सामने लगी भीड़ में कराह रहा हो, और कोई उसे ये ज्ञान दे रहा हो कि "कश्मीर में सैनिक इतनी ठण्ड में खड़े होते हैं, तुम ATM के सामने खड़े नहीं हो सकते", तो ये मूर्खता है और ये गलत भी है| लेकिन ऐसे मूर्खों पर ऊँगली उठाने से पहले ये देख लीजिये कि कहीं वो आपके राजनीतिक आइडियोलॉजी वाला तो नहीं, अन्यथा आपको  liberal, turncoat या opportunist बनते समय नहीं लगेगा|  

Thursday, April 06, 2017

आख़िर जनता अपनी औकात क्यों भूल जाती है?

एयर इंडिया वाले हादसे के बाद मेरी नज़र में संजय राउत जी के लिए इज़्ज़त और भी बढ़ गयी है। पूरी घटनाक्रम में जहाँ लोग गोल गोल बातें कर रहे हैं, वहां संजय जी ही एक इंसान हैं जिन्होंने तो टूक में सत्य बोल दिया। राजनीति में सत्य सुनने के लिए अमूमन कान तरस जाते हैं, पर ये संजय जी का बड़प्पन कहिये कि उन्होंने स्पष्ट पूछ लिया, "आखिर एयर इंडिया क्या है? कौन है इसका सीएमडी? क्या है उनकी औकात?"





इसे भारत का दुर्भाग्य समझिये कि एक दिन वोटिंग मशीन पर अंगूठा दबाकर और स्याही वाली ऊँगली की तसवीरें फेसबुक पर डालकर देश की आम जनता अक्सर ये भूल जाती है कि उसकी औकात क्या है| अच्छी बात ये है कि समय समय पर प्रजातंत्र में ऐसे संदेशवाहक अवतरित होते है जो यूटोपिया में भटके हुए मानवों को उनकी औकात याद दिला देते हैं।  

माननीय गायकवाड़ जी ने चप्पल ही तो मारा था, इसमें इतना बवाल करने की क्या ज़रुरत थी। इस बात को "इतना तो चलता है" बोलकर टाला भी तो जा सकता था ना? वैसे ही जैसे जब टोल बूथ पर जब निहत्थे कर्मचारी को नेता थप्पड़ मार देता है या जब सड़क पर चलती हुई लड़की पर कुछ मनचले लोग हमारे सामने भद्दी टिप्पणी करते हुए चले जाते हैं या जब सड़क पर किसी बेक़सूर को मार खाता हुआ देख हम बोल देते हैं "इतना तो चलता है" लोगों का खून खौलता हुआ देख कर आश्चर्य भी होता है। जब देश की सबसे बड़ी पार्टी (भारतीय जनता पार्टी), जिसे इतना महान बहुमत मिला है वो इस मुद्दे पर शांत है तो ये तुच्छ लोग इतना खून क्यों खौला रहे हैं| 

भारतीय जनता पार्टी की सबसे अच्छी बात ये है कि वो कांग्रेस की तरह मौकापरस्त नहीं है| कांग्रेसियों को लगा कि एयर इंडिया वालों को ही ज़िम्मेदार और ग़लत बता कर कुछ राजनीतिक brownie point उठा ले, तो उन्होंने वो किया। हर तरफ से हारे इंसान को जहाँ भी रास्ता दिखता है, वहां मुह मार लेता है| यही हाल कांग्रेस का है। भारतीय जनता पार्टी ने ऐसा कुछ नहीं किया| देश की सबसे बड़ी पार्टी ने मौन धारण कर लिया और यूनानी  तरह ये मान लिया कि समय आने पर सब ठीक हो जायेगा| इक्का दुक्का नेताओं ने धृतराष्ट की तरह ये बोल दिया कि ये सही नहीं था, एक सांसद को ये शोभा नहीं देता। 

हम बीजेपी की मजबूरी समझ सकते हैं| उन्हें राज्य सभा में बहुमत चाहिए, उन्हें राष्ट्रपति चुनना है, उन्हें डिप्लोमेसी भी बनाये रखना है। अब इसमें एक दो लोग चप्पल खा ले तो क्या गलत है? इतना तो चलता है|  

संजय राउत जी ने एक अच्छा वाला चुटकुला भी सुनाया था| उन्होंने कहा कि एयर इंडिया वाले जनता के सेवक हैं, उन्हें औकात पर रहना चाहिए| मैं भूल गया था कि इलेक्शन के समय ये लोग भी अपने आप को जनता का सेवक ही बोलते हैं, जिसका मतलब ये है कि इन्हे भी...   

अब दिमाग को ज्यादा मत दौड़ाइए। औकात में रहिये!

तुम्हारे दीदार से मुक़म्मल होती थी वो कवितायेँ  जो आज कल अधूरी-अधूरी ही ख़त्म हो जाती हैं.