Saturday, December 01, 2012


जब भी सुनता हूँ
ये समाज और रिवाज़ वाली दुहाई
जब भी पढता हूँ
ये संस्कृति और शिष्टाचार की लड़ाई
ताक कर देख लेता हूँ कि
आख़िर ये आवाज़ उठी कहाँ से है
कौन सा कूचा है
मुहल्ले की विरादरी क्या है

अक्सर वही लोग मिल जाते हैं
जिनकी वासनाएं और छिछोरी ख्वाइशें
रोशंदानियों से झाकती रह गयीं,
जब उनके पंख छोटे छोटे थें
पर दीवारों के डर से बहार नहीं निकल पायीं।

वही आवाज़ रहती है,
जिसमे नंगापन बहुत था, और
जिनकी गूंज अंजान जिस्म को चूसने के लिए बौराई रहती थी
लेकिन समाज के लिहाज़ में
बस पानी में बुलबुला बन कर रह गयें।

नाखूनों से गलियों की दीवारों पर
ज़िस्म खरोचने वाले
जब shawl ओढ़ाने आते हैं,
मैं और भी ज्यादा नंगा होते जाता हूँ

इश्क़ मुहब्बत वाला लौंडा जब झंडा लेकर घूमने लगा

2012 के मई की चिलचिलाती गर्मी चीटियों की तरह शरीर पर चुभ रही थी| ज़मीन एक एक क़तरा पानी के लिए ललचाये निग़ाहों से आसमान की तरफ़ ताक रहा था, लेक...