Friday, August 03, 2012

फूहड़ता बिकती है

घर में, शहर में
जंगल, खेत, नहर में 
चूल्हे पर रोटियों की तरह सिकती हैं
फूहड़ता बिकती है 

हम मानने के लिए मान लेते हैं कि 
सामने वाला भद्दा और मैला है
हम चेहरा देख कर परख़ लेते हैं कि 
ज़ेहन में उसके पनपता हुआ सोच - विषैला है 

आईने में सब दिखता है
ये तम झाम,
ये शोर शराबा
अपनी दरिंदगी ही नहीं दिखती है
आईने का सच नहीं बिकता, फूहड़ता बिकती है

इश्क़ मुहब्बत वाला लौंडा जब झंडा लेकर घूमने लगा

2012 के मई की चिलचिलाती गर्मी चीटियों की तरह शरीर पर चुभ रही थी| ज़मीन एक एक क़तरा पानी के लिए ललचाये निग़ाहों से आसमान की तरफ़ ताक रहा था, लेक...