Wednesday, June 13, 2012

दो alien
रात भर बैठे रहें,
lamp post के नीचे

शुन्य की बातें,
शुन्य सी बातें,
बनती थी, फिर
गुब्बारें बनकर अनंत में उड़ जाती थीं
दो alien
रात भर,
गुब्बारों की फूंक में भरे रहें

सुलझे धागे
उलझे हिस्से
दांत कांटे जूठे किस्से

तेरे प्याले की चाय बहुत नशीली थी
रात चुस्कियों की नरमी में बीत गयी

दो alien
रात भर बैठे रहें,
lamp post के नीचे

Resonance

किलकारियों से शुरू होकर,
कराहों में ख़त्म हो जाती है
बीच में यौवन का रूमानी 'आह आह'
और तूफानी 'वाह वाह'
कमाल का music system बनाया है उपरवाले 
उम्र के resonance में बजता है

तुम्हारे दीदार से मुक़म्मल होती थी वो कवितायेँ  जो आज कल अधूरी-अधूरी ही ख़त्म हो जाती हैं.