Saturday, December 01, 2012


जब भी सुनता हूँ
ये समाज और रिवाज़ वाली दुहाई
जब भी पढता हूँ
ये संस्कृति और शिष्टाचार की लड़ाई
ताक कर देख लेता हूँ कि
आख़िर ये आवाज़ उठी कहाँ से है
कौन सा कूचा है
मुहल्ले की विरादरी क्या है

अक्सर वही लोग मिल जाते हैं
जिनकी वासनाएं और छिछोरी ख्वाइशें
रोशंदानियों से झाकती रह गयीं,
जब उनके पंख छोटे छोटे थें
पर दीवारों के डर से बहार नहीं निकल पायीं।

वही आवाज़ रहती है,
जिसमे नंगापन बहुत था, और
जिनकी गूंज अंजान जिस्म को चूसने के लिए बौराई रहती थी
लेकिन समाज के लिहाज़ में
बस पानी में बुलबुला बन कर रह गयें।

नाखूनों से गलियों की दीवारों पर
ज़िस्म खरोचने वाले
जब shawl ओढ़ाने आते हैं,
मैं और भी ज्यादा नंगा होते जाता हूँ

3 comments:

Manjeet Taram said...

"अक्सर वही लोग मिल जाते हैं
जिनकी वासनाएं और छिछोरी ख्वाइशें
रोशंदानियों से झाकती रह गयीं,
जब उनके पंख छोटे छोटे थें
पर दीवारों के डर से बहार नहीं निकल पायीं। "

जे बात बोली तुमने दोस्त ...और दूसरी पसंदीदा लाइन

"नाखूनों से गलियों की दीवारों पर
ज़िस्म खरोचने वाले
जब shawl ओढ़ाने आते हैं,
मैं और भी ज्यादा नंगा होते जाता हूँ"

Manu Tyagi said...

प्रिय ब्लागर
आपको जानकर अति हर्ष होगा कि एक नये ब्लाग संकलक / रीडर का शुभारंभ किया गया है और उसमें आपका ब्लाग भी शामिल किया गया है । कृपया एक बार जांच लें कि आपका ब्लाग सही श्रेणी में है अथवा नही और यदि आपके एक से ज्यादा ब्लाग हैं तो अन्य ब्लाग्स के बारे में वेबसाइट पर जाकर सूचना दे सकते हैं

welcome to Hindi blog reader

yug said...

गजब के कटाक्ष होते है आपके … कतई नंगा कर जाते हैं।

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