Sunday, September 23, 2012

चटनी


दिन भर सिलबट्टे पर घिसा होगा माँ ने
            धनिया, हरी मिर्च और लहसुन
नमक और सरसों डालने में लगा दी होगी
      अपने अनुभव की सारी mathematics
                   ममता की सारी economics
तब कहीं,
चटनी में 'वाह' वाला स्वाद आया होगा
'आह' वाला हरा रंग आया होगा

तुमने पराठे जल्दी निगलने के चक्कर में
बाज़ार से tomato ketch -up खरीद लिया था

अब पूछते हो कि
मज़हब के नाम पर
सुर्ख़ रंग का खून क्यूँ बिकता है बाज़ार में

No comments:

इश्क़ मुहब्बत वाला लौंडा जब झंडा लेकर घूमने लगा

2012 के मई की चिलचिलाती गर्मी चीटियों की तरह शरीर पर चुभ रही थी| ज़मीन एक एक क़तरा पानी के लिए ललचाये निग़ाहों से आसमान की तरफ़ ताक रहा था, लेक...