Thursday, May 24, 2012

आपके देखते देखते...

आपके देखते देखते
ये आग महँगी हो गयी है

सूखी टहनियां चैन नहीं दे पातीं हैं जब,
हम धर्म और जाति के बेफिज़ूल वज़ह सोचकर
कोई घर जला आ जाते हैं
बेफिज़ूल वाले वजह सोचते सोचते 
ये राख़ महँगी हो गयी है 
ये आग महँगी हो गयी है 

जब किसी अपरिचित के घर में
बहन बेटी सुलगाई जाती है,
पेट्रोल की हवस में दह्लाई जाती है
हम अख़बार के पन्ने पलटकर,
democracy पर दाग पोत आते हैं
democracy पर दाग पोतते पोतते
हर दाग महँगी हो गयी है
ये आग महँगी हो गयी है

धूप में पिसता हुआ किसान,
घिसता हुआ किसान
किसी भ्रष्ट के पेट की भूख में जल जाता है
पेट के लिए घिसते हुए
अब साग महँगी हो गयी है
ये आग महँगी हो गयी है

poverty line नीचे गयी, पर
हर घोल महंगा हो गया है
democracy में चीख़ नहीं सकतें
इंसानों का बोल महंगा हो गया है
क्या ख़ाक जलाएं विचारों को,
पेट्रोल महंगा हो गया है

आपके देखते देखते...

Saturday, May 05, 2012

किसे चाहिए?

रोटी, कपडा और मकान
खद्दर की लंगोटी, मीठा बनारसी पान
दो जून का चूल्हा,
बड़ा खुला मचान
किसे चाहिए? किसे चाहिए?

Generation बदल गया हैचाहते बदल गयी हैं
सेक्स, पैसा और दारु की दूकान
Virtual इश्क़, Search-ual ज्ञान
भाड़ में जाए सभ्यता,
संस्कृति दारु में डूब जाए विज्ञान

किसे चाहिए? किसे चाहिए?

चूहों को ज़हर देना ज़रूरी है

चूहों को ज़हर का डर ना हो तो,
क्रांति और इंक़लाब की बातें करने लगते हैं;
अचानक से किसी एक चूहे को
आज़ादी की भूख़ लग जाती है,
और उसकी भूख़ ख़ा जाती है, बाकी चूहों की सोच को


Physics जितना mass पर act करता है,
उतना ही सोच पर भी;
श्रृष्टि हर श्रृजन को अंडाकार बना देती है
ग्रहों को देखा है,
oval होते जाते हैं, और oval रस्ते पर घूमते जाते हैं;
सोच का भी वही खेल है.


एक चूहे की इन्क़लाबी सोच,
हज़ार चूहों को gravitationally pull करती है;
हवस का wave resonate करता है ,
फिर सब कुछ oval ही oval;
चूहे इन्क़लाबी हो जाते हैं.


Democracy में ज़हर देना जरूरी है
एक सिक्का, 
धीरे धीरे aluminium वाले पत्तों को पिघलाता रहता है 
hydrogen sulphate की तरह 
aluminium नहीं रहेगा, तो कटोरा कौन बनाएगा
भूख़ लगेगी तो क्रांति पनपेगी 
चूहों को ज़हर देना ज़रूरी है 

तुम्हारे दीदार से मुक़म्मल होती थी वो कवितायेँ  जो आज कल अधूरी-अधूरी ही ख़त्म हो जाती हैं.