Wednesday, February 15, 2012

वक़्त

वक़्त
धीरे धीरे
ज़िन्दगी के पन्नों को घोलता रहता है
बढ़ता रहता है...
पीछे पलटकर देखता हूँ तो
इतिहास? सब इतिहास? बस इतिहास?

चुपके चुपके
कितनी रातें
ढिबरी में जल जाती हैं

धीरे धीरे सारी यादें,
किस्सों में ढल जाती हैं


यादों पर कभी हँसता हूँ,
यादों पर कभी रोता हूँ
फ़िर से जब भी,
यादों वाली गलियों में,
बचपन मैं खोजने बढ़ता हूँ
इतिहास! सब इतिहास! बस इतिहास!

1 comment:

poonam said...

bahut khub...

तुम्हारे दीदार से मुक़म्मल होती थी वो कवितायेँ  जो आज कल अधूरी-अधूरी ही ख़त्म हो जाती हैं.