Friday, January 06, 2012

Vulgarity

दीमक
खरोचते हैं
लकड़ियों को
उन्हें भूख से ज्यादा
लकड़ियों की रूखी आवाज़ पसंद है
सच कहूँ तो,
उस रूखी आवाज़ में जो vulgarity होती है
मुझे कई रात जागने पर मज़बूर कर देती है  
मैं जागता हूँ, क्यूंकि 
मुझे दीमक वाले ख्यालों के साथ
सोने में डर लगता है

2 comments:

Deepak Agarwal said...

I don't see vulgarity in such fine piece of music.....

Deepak Agarwal said...

It is a way of life some of them love to live with .....

तुम्हारे दीदार से मुक़म्मल होती थी वो कवितायेँ  जो आज कल अधूरी-अधूरी ही ख़त्म हो जाती हैं.