Saturday, April 16, 2011

समाज

अखब़ार का एक टुकड़ा
बाहर से जला हुआ,
और राख़ वाली परिधि के दरमयां
सिर्फ़ तुम्हारा ज़िक्र.

हुमाद की वही खुशबू,
जिसका कोई आकर नहीं, 
जिसकी कोई दिशा नहीं;
ठंडी आवाज़ में बजती घंटियों सा चमकता है,
दीया और पुष्प जैसा नदियों में बिख़र जाता है.

हम घोसला बनाते हैं
जिसपर,
कभी चाँद लटकता है, कभी शराब की बोतलें
कभी वहां चूजों के मासूम सवाल गूंजते हैं,
और कभी दरिंदगी और लालच भरी चीखें.

दीवार के एक कोने पर चढ़कर,
दूसरे कोने पर आहटों का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं सभी,
वज़ह और बहाने अलग हो शायद.

मैं भी समाज हूँ.

ये "हम लोग" वाले लोग जब inert या blind हो जाते हैं तो स्थिति बहुत डरावनी हो जाती है|

एक और 15 अगस्त आने वाला है| बहुत कुछ वैसा ही होगा, जैसा हर साल होता है| Facebook और twitter पर profile picture बदल दिए जाएंगे; whatsapp पर ...