Wednesday, November 30, 2011

College Days

वक़्त कितने भी ठिकाने ले
"क़ल्ब" अब तक College में भटकता रहता है 
उम्र नयी शौक, नए मिजाज़ से खेल ले
ज़ेहन में आज भी मेरे लेकिन, 
उन्ही ख्यालों का ज़िक्र अटकता रहता है 


शहर बदल गया है, 
तारीख़ भी लुढ़कती हुई काफ़ी आगे बढ़ चुकी है
ज़िन्दगी  ने अपने तौर तरीके बदल लिए हैं
और एक हम हैं 
Engineering College के माहौल से निकल नहीं पातें
आलिम कहता है, दुनिया के दस्तूर में ढल जाओ 
और हम इन ख्यालों को निगल नहीं पातें 

आवाम को मेरे बेतुके ख्यालों का फ़िक्र खटकता रहता है
ज़ेहन में आज भी मेरे लेकिन, 
उन्ही ख्यालों का ज़िक्र अटकता रहता है 


 

Saturday, November 26, 2011

26/11

हमारे किस्सों का, हमारे मनोरंजन का
आकार जो इतना बदल गया है 

Facebook की दीवारों पर
श्रद्धांजलि और क्रांति की बातें लौट आयी हैं
हमारा गुस्सा, आग की लहरों सा फ़िर फैलेगा
हम like करेंगे, arguments लिखेंगे
फ़िर अगली ख़बर की भूख़ में facebook पर वापस चल पड़ेंगे

आग लगती है,
ख़ून की स्याहियों में डुबोकर ख़बर का इक चेहरा 
बाज़ार में पड़ोसा जाता है.
संवेदनाओं की अगरबत्तियां
हिन्दुस्तान के कूचे कूचे में जलती हैं
ख़बर की कब्र अगले साल तक फ़िर महफूज़ रहती है

असमर्थता यह नहीं कि हम कुछ कर नहीं सकतें 
असमर्थता यह है कि,
हमें मालूम नहीं हम कुछ करना ही क्यूँ चाहते हैं 

हमारे किस्सों का, हमारे मनोरंजन का
आकार जो इतना बदल गया है 

Monday, November 21, 2011

Why this kolaveri kolaveri kolaveri di

When mind is without Fear
and choices are for free..
Then why this kolaveri kolaveri kolaveri di

कोई States से अनजान हैं, कोई status में परेशान है
कल तक,
भ्रष्टाचार पर मिटने वाला Facebook Generation,
आज Sunny Leon पर क़ुर्बान है

वही मुल्क़, जो चाँद पड़ोसने की ख्वाईशें रखता था
लोग कहते हैं - आज culturally developed हिन्दुस्तान है

किसी के चाय की चुस्कियों की क़ीमत,
प्रदेश के चार टुकड़ों पर भारी पड़ती है,
हजारों रात कहीं कहीं..
सूखी रोटी के टुकड़ों पर कितनी ज़िंदगियाँ झपटती हैं

खैर, पेट भर चूका है,
दफ़्तर में बहुत आप धापी थी,
लौटते समय ठेके पर मैंने और तुमने,
बुद्धि जीवियों वाली बहुत बातें कर ली ...

When mind is without Fear
and choices are for free..
Then why this kolaveri kolaveri kolaveri di

Sunday, November 13, 2011

Some small trips...

विचारों और संवेदनाओं की मशाल,
पेट की भूख से अधिक ज्वलंत हो जाती हैं;
कभी कभी...
राष्ट्रीयता और धर्म की छाँव,
स्वार्थ की बेड़ियों से स्वतंत्र हो जाती हैं;
कभी कभी...

कुछ छोटी यात्रायें,
बड़ी दूरियां तय करने की मंत्र हो जाती हैं;
कभी कभी...

तुम्हारे दीदार से मुक़म्मल होती थी वो कवितायेँ  जो आज कल अधूरी-अधूरी ही ख़त्म हो जाती हैं.