Wednesday, March 02, 2011

नाव

वहां, 
उन अलसाए रस्तों के किनारे 
सुस्त सा दरिया है कोई. 
कभी बचपन में मैंने 
वहां कागज़ की इक नाव डाली थी. 
सुना है कि, 
आज भी वह नाव वहां मद मस्त बहती है.

कहीं टूटे से छज्जों पर,
परिंदे जब घोसलों में 
अधखुली आँखों से अंगराई लेते हैं
कहीं बिस्तर की सिलवट में 
कुछ ख़्वाब करवटें लेते हैं 
मुझे लगता है कि फिर से नाव बनकर 
नदी में मद मस्त हो जाऊं.

6 comments:

Parul said...

sundar parikalpna!

क्षितिजा .... said...

bahut khoobsurat rachna ... amazing collection of thoughts ..

DALIT ADHIKAR SURKSHA MANCH said...

mast rachna. behatarin khyal-khwaab se sajaya hua.adbhut parikalpana hai. likhte rahiye. hamari shubhkamana aapke sath hai.

DALIT ADHIKAR SURKSHA MANCH said...

bahut achchhi rachna.

' मिसिर' said...

आपके कमेन्ट से आपकी रचनाओं तक पहुंचा !
अच्छा लिखते हैं आप ! स्पेलिंग पर थोडा ध्यान दीजिये !

baabusha said...

Beautiful !

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