Thursday, March 31, 2011

उफ्फ़

तुम कभी हो
इश्क़ का कतरा,
और कभी आवारगी
तुम कभी फ़िरदौस की सूरत
और तुम कभी हो ज़िंदगी
दीवानों का क्या कोई जिस्म
कोई मज़हब नहीं होता है?

तुम कभी चांदनी को फूटपाथ समझकर सो जाते हो,
तुम कभी खुशबू बनकर 
पलकों में भी खों जाते हो
दीवानों का क्या कोई घर,
कोई शहर नहीं होता है?

Wednesday, March 02, 2011

नाव

वहां, 
उन अलसाए रस्तों के किनारे 
सुस्त सा दरिया है कोई. 
कभी बचपन में मैंने 
वहां कागज़ की इक नाव डाली थी. 
सुना है कि, 
आज भी वह नाव वहां मद मस्त बहती है.

कहीं टूटे से छज्जों पर,
परिंदे जब घोसलों में 
अधखुली आँखों से अंगराई लेते हैं
कहीं बिस्तर की सिलवट में 
कुछ ख़्वाब करवटें लेते हैं 
मुझे लगता है कि फिर से नाव बनकर 
नदी में मद मस्त हो जाऊं.

इश्क़ मुहब्बत वाला लौंडा जब झंडा लेकर घूमने लगा

2012 के मई की चिलचिलाती गर्मी चीटियों की तरह शरीर पर चुभ रही थी| ज़मीन एक एक क़तरा पानी के लिए ललचाये निग़ाहों से आसमान की तरफ़ ताक रहा था, लेक...