Friday, February 25, 2011

बेवजह


कोई ऐसे भी तो हमसे मिले कभी कभी,
कि बेवजह ही उनसे मुहब्बत होती जाए
मौसम में बेताबी के छीटें कुछ एक गिरें
शरारत हमारी सारी शराफ़ात होती जाए

ख्यालों की हर कशिश, दुआओं में हो कबूल
ख्वाबों की ऐसी कभी गुज़ारिश होती जाए
कोई ऐसे भी तो हमसे मिले कभी कभी,
कि बदनामी हमारी शोहरत होती जाए


Friday, February 18, 2011

फ़ुरसत


ज़िन्दगी के जिस श़क्ल से
हमे मुहब्बत हुआ करती है,
उस इश्क़ को फ़रमाने की 
फ़ुरसत नहीं रहती है.

ऐसा नहीं था कि
आइनों में बस दरारें ही दरारे थीं;
ऐसा भी था नहीं कि,
रास्ते खो जाते थें धुंध में 
और सामने बस संगमारी दीवारे थीं.

साहिर ने जिन चराग़ की
ख्वाइश में उम्र गुज़ार दी,
बाज़ार में उन चरागों की,
जब क़ीमत नहीं रहती है
...बहाने मिलते जाते हैं,
इंसान उलझता जाता है.
  
आलम को अब्र की उचाईयों का नशा है,
और शायर निकम्मा, 
सावन में भीगने को रोता है.

Sunday, February 13, 2011

इश्क़

सुबह छिटक कर,
बिस्तर में आ जाता है
सूरज का कुछ टुकड़ा;
अंगराईयां मेरी- मुट्ठी में उन्हें भर लेती हैं.

'बालकनी' में 
जब भी मिलते हैं आपस में - एक प्याली चाय की चुस्की
और, मिट्टी की सौंधी सी खुशबू;
मैं पंख लगाकर, 
हौले हौले नन्हे पत्तों सा बह लेता हूँ.

थोड़ा थोड़ा चाँद चुराकर,
लिफाफों को रंगते आये हैं - 'तुम और मैं'

लेकिन,
पतझड़ की किसी सांझ को जब,
लालटेन नहीं जलता है, और 
चाहतों की चीख़ नाकाम होती है
हम, राख़ के जैसे बिख़र जाते हैं.
सुलगती जाती है बेचारी ज़िंदगी,
और,
किसी बेनाम चौराहे पर बदनाम होती है.

चलो, 
ओढ़कर इसकी ख़ुशबू, ज़िंदगी से थोड़ा इश्क़ करते हैं,
ज़िंदगी के नाम पर मरने से पहले, ज़िंदगी जी लेते है.

तुम्हारे दीदार से मुक़म्मल होती थी वो कवितायेँ  जो आज कल अधूरी-अधूरी ही ख़त्म हो जाती हैं.