Sunday, October 31, 2010

"चैप्टर"

आज तुम्हे "हैपी जर्नी" भी नहीं कह पाया
तुम्हे "स्टेशन" छोड़ते समय लगा कि
ज़िस्म का एक हिस्सा वहीँ छूट गया है;
और बचे टुकड़ों को घसीट कर,
मैं अपने घरौंदे में लौट आया हूँ.

वक़्त की रेत,
आसुओं को तो धीरे धीरे ढक देगी.
और संवेदनाएं स्याही बनकर,
पन्नों से लिपट जाएँगी.
पर,
तुम्हारे साथ गुज़ारे वक़्त की खुशबू,
बस रूह में धीमी धीमी महकती रहेंगी
मैं कभी उन्हें शब्दों के दायरे में कैद नहीं कर सकता.

एक "फ्रेश चैप्टर" शायद ख़त्म हो गया है.
तुम्हारे वापस लौटने पर नया "चैप्टर" शुरू करूँगा.

ये "हम लोग" वाले लोग जब inert या blind हो जाते हैं तो स्थिति बहुत डरावनी हो जाती है|

एक और 15 अगस्त आने वाला है| बहुत कुछ वैसा ही होगा, जैसा हर साल होता है| Facebook और twitter पर profile picture बदल दिए जाएंगे; whatsapp पर ...