Sunday, October 31, 2010

"चैप्टर"

आज तुम्हे "हैपी जर्नी" भी नहीं कह पाया
तुम्हे "स्टेशन" छोड़ते समय लगा कि
ज़िस्म का एक हिस्सा वहीँ छूट गया है;
और बचे टुकड़ों को घसीट कर,
मैं अपने घरौंदे में लौट आया हूँ.

वक़्त की रेत,
आसुओं को तो धीरे धीरे ढक देगी.
और संवेदनाएं स्याही बनकर,
पन्नों से लिपट जाएँगी.
पर,
तुम्हारे साथ गुज़ारे वक़्त की खुशबू,
बस रूह में धीमी धीमी महकती रहेंगी
मैं कभी उन्हें शब्दों के दायरे में कैद नहीं कर सकता.

एक "फ्रेश चैप्टर" शायद ख़त्म हो गया है.
तुम्हारे वापस लौटने पर नया "चैप्टर" शुरू करूँगा.

3 comments:

Parul said...

आज तुम्हे "हैपी जर्नी" भी नहीं कह पाया
तुम्हे "स्टेशन" छोड़ते समय लगा कि
ज़िस्म का एक हिस्सा वहीँ छूट गया है;
और बचे टुकड़ों को घसीट कर,
मैं अपने घरौंदे में लौट आया हूँ.
bahut damdaar shuruaat gadhi hai aapne..awesome!

VaRtIkA said...

:)

MangoMan said...

It happens everytime I see off my girl!!!! Well captured, bud!

इश्क़ मुहब्बत वाला लौंडा जब झंडा लेकर घूमने लगा

2012 के मई की चिलचिलाती गर्मी चीटियों की तरह शरीर पर चुभ रही थी| ज़मीन एक एक क़तरा पानी के लिए ललचाये निग़ाहों से आसमान की तरफ़ ताक रहा था, लेक...