Wednesday, September 08, 2010

हिस़ाब

सच तो ये भी है कि,
वक़्त की सारी साजिशें समझते हैं हम,
और,
खून की उबाल पर लगाम कसने वाले उसके ख़याल से,
अन्दर ही अन्दर जलते हैं हम.

सच तो ये भी है कि,
आईने और झुर्रियां - दोस्ती को बेताब हैं,
और,
रूह को कब्ज़े में रखने की तरक़ीब
उसने सीख ली है.

उठो, चलो !
सच की ऐसी कैफ़ियत को अनसुना करते हैं हम.
तोड़ते हैं आईने का श़क्ल, और,
पिंजरे के परिंदे को आज़ाद करते हैं.

आख़िर उम्र भी कभी ना कभी हिस़ाब मांगेगी

7 comments:

Anjana (Gudia) said...

आख़िर उम्र भी कभी ना कभी हिस़ाब मांगेगी

well said!

Shivang said...

i am feeling old
:(

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया.

crazy devil said...

@ Anjana and Sameer Sir - Thanks
@ Shivang :) waqt rukta hai kahin tham kar...iski aadate bhi aadmi si hai

Anonymous said...

gud1..touched the heart..very true..manish

MangoMan said...

awesome, boy! reminded me of rdb..khalbali!

todte hain aaine ki shakl!! rad!

Anonymous said...

Sir, u must have heard this many times for your posts ... i suppose... but there's no harm repeating it again... u write with such expressions and so much emotions that it feels true.. about everything u write! keep writing... waiting for your next post.. sincere admirer.. ritika

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