Saturday, May 01, 2010

अट्ठन्नी

आठ साल का था
जब,
चोकलेट के लालच में,
अलमारी से मैंने अट्ठन्नी चुरायी थी;
पकड़ा ना जाऊ,
इस डर से,
हडबडाहट में घर के पीछे लगे बरगद में,
उसे मैं गाड़ आया था.

दौड़ भाग और कशमकश में,
अट्ठन्नी के साथ साथ,
बरगद ने मेरी रूह का एक टुकड़ा भी निगल लिया था, शायद
और,
ज़िस्म पर छोड़ दिया एक ख़रोच.

आज बरगद बड़ा हो गया है;
अपनी शाख से, ढक लेता है सूरज को.
सूरज घूमता तो है, लेकिन
हर पहर रात जैसी ही होती है.
जब भी नए चोकलेट खाने की कोशिश करता हूँ,
अँधेरा दबोचने को दौड़ता है
और मेरे रूह की कीमत,
उस अट्ठन्नी से सस्ती महसूस होने लगती है.

बचपन का खुरेंचा हुआ वह घाव,
आज भी इंतज़ार कर रहा है,
गर्द की परतों का;
इस बार मैं अट्ठन्नी चुराकर मलहम नहीं खरीदूंगा.

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