Friday, September 18, 2009

बेतुके

दर्द की हँसी

वक्त के साथ साथ

मुरझा गई।


आंधी का पंजा

बहुत नुकीला था;

ज़ख्मी ढिबरी

काँप काँप कर हार गई।


झील के आंसू

बहते बहते सूख गए;

ज़ालिम पतझर,

पल्लव उसके कल नोंच गया।


तेरी चिट्ठी,

बारिश में वो पढता था ,

पिघले पन्ने अंगीठी में,

कल बुझे मिले ...


Ugly

लोहा, लक्कड़, ताला, चक्कर घिच-पिच कर के बैठा है बाहर से चमचम करता है दिल अंदर से ugly है मौसम, पानी, सात समंदर गलियों गलियों घूमा है...