Sunday, May 17, 2009

जिदद




















खण्डहर
के सख्त टूटे जिस्म में,
उस कोने में,
गर्द की परतों के निचे,
एक चिराग़ दफ़न था;
उसके अरमानों की नब्ज,
ख़यालों के कश्मकश में दम तोड़ने लगी थी।

तुम्हारी फूँक ने शायद,
चिराग़ में रौशनी डाल दी है।

अब,
खण्डहर
की जिदद है कि,
तुम्हारा एहसास
पुराने किस्सों की तरह,
ख्वाइशों के जिन्न को जगा सकता है।

Ugly

लोहा, लक्कड़, ताला, चक्कर घिच-पिच कर के बैठा है बाहर से चमचम करता है दिल अंदर से ugly है मौसम, पानी, सात समंदर गलियों गलियों घूमा है...